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हिंदू समाज के आचार-विचार

यह यज्ञोपवीत संस्कार पुनः जन्म के समान होता है।

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2.147. व्यक्ति को अपना जन्म साधारण हुआ समझना चाहिए, क्योंकि यह जन्म

उसके माता-पिता ने परस्पर सुख प्राप्त करने के बाद दिया और उसे यह जन्म

माता के गर्भ में प्राप्त हुआ था।

2.148. लेकिन जो जन्म उसका आचार्य, जो संपूर्ण वेद जानता है, दिव्य माता

गायत्री के द्वारा उसे प्राप्त कराता है, वह ही वास्तविक जन्म होता है, यह जन्म

अजर और अमर होता है।

2.169. पहला जन्म असली मां से होता है, दूसरा जन्म यज्ञोपवीत धारण करने पर

होता है और तीसरा जन्म यज्ञ-कर्म करने के बाद होता है। वेद के अनुसार ये उस

व्यक्ति के जन्म होते हैं, जिसे सामान्यतः द्विज कहा जाता है।

2.170. इनमें दिव्य जन्म वह होता है जिसमें यज्ञोपवीत धारण किया जाता है, ऐसे

जन्म में गायत्री उसकी मां होती है और आचार्य उसका पिता होता है।

मनु ने यह संस्कार शूद्रों और स्त्रियों के लिए स्वीकृत नहीं किए हैं।

2.103. लेकिन जो प्रातःकाल इसका खड़े होकर और संध्या समय में बैठकर

पाठ नहीं करता है, उसे शूद्र समझ कर प्रत्येक द्विज कर्म से बहिष्कृत कर देना

चाहिए।

मनु शिक्षा और अध्ययन के संबंध में नियमों का उल्लेख करना नहीं भूलता। मनु ने सामूहिक शिक्षा के विषय में कुछ नहीं कहा है। मनु इसकी कोई उपयोगिता नहीं मानता और वह इस संबंध में राजा या शासन के लिए कोई कर्तव्य निश्चित नहीं करता। वह केवल धर्मग्रन्थों, अर्थात् वेदों के अध्ययन के बारे में चिंतित रहा।

वेद का अध्ययन आचार्य से और उनकी सहमति से किया जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति वेद का स्वयं अध्ययन नहीं कर सकता। अगर वह ऐसा करता है, तब वह चोरी करने का अपराध करता है।

2.116. जो अपने आचार्य की सहमति के बिना वेद का ज्ञान प्राप्त करता है, वह

शास्त्रों की चोरी करने का अपराध करता है और वह नरक में गिरता है।

9.18. स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नहीं होता। यह शास्त्र द्वारा निश्चित है।

चूंकि इस संबंध में धर्मशास्त्र में कोई साक्ष्य नहीं है और इनके लिए प्रायश्चित

का कोई विधान नहीं है, अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं, वे पापयुक्त हैं,

और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है।

4.99. वह वेद का पाठ स्वराघात और अक्षरों के स्पष्ट उच्चारण के बिना न करे,