8. हिंदू समाज के आचार-विचार - Page 247

232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वह शूद्र की उपस्थिति में भी वेद-पाठ न करे, रात्रि के अंतिम प्रहर में पाठ आरंभ करने पर यदि वह थक जाए तो पुनः सो जाए।

यह निषेध तीनों उच्च वर्णों के व्रात्यों या जातिच्युत लोगों के लिए भी है। मनु कहता हैः

2.40. ऐसे अपवित्र व्यक्तियों के साथ कोई भी ब्राह्मण वेदाध्ययन में या साहचर्य में कोई संबंध नहीं रखे, चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए।

अयोग्य घोषित व्यक्तियों के लिए यज्ञ-कर्म करना या उन्हें वेद का अध्ययन कराना मनु द्वारा निषिद्ध था।

4.205. जो यज्ञ-कर्म वेद-पाठ के बिना हुआ हो, जो यज्ञ-कर्म बहुत सारे यज्ञ कराने वाले यज्ञकर्मी के द्वारा किया गया हो, जो यज्ञ-कर्म स्त्री या नपुंसक द्वारा कराया गया हो, उनमें ब्राह्मण कभी भी भोजन न करे।

4.206. जब वे लोग घी की आहुति देते हैं, तब वह सज्जनों की श्री की हानि करता है और देवताओं में अरुचि उत्पन्न करता है, इसलिए ऐसे यज्ञ-कर्म से वह सतर्क हो संपर्क नहीं रखे।

11.198. जो व्यक्ति जातिच्युत व्यक्तियों के लिए यज्ञ-कर्म कराता है या जो अपरिचित का दाहकर्म करता है या जो किसी अबोध की हत्या के निमित्त यज्ञादि करता है या जो अशुद्ध यज्ञ करता है जिसे अहिंसा कहते हैं, वह अपने पाप के प्रायश्चित स्वरूप तीन प्रजापत्य तपस्या करने के बाद शुद्ध होता है।

अब कानून के क्षेत्र में समानता विषय लेते हैं। जब वे साक्षी के रूप में प्रस्तुत होते हैं, तब मनु के अनुसार उनसे नीचे लिखी विधि के अनुसार शपथ कराई जाएः

8.87. न्यायकर्ता शुद्ध होकर प्रातःकाल अनेक आहूत द्विजों के साथ जो शुद्ध हों किसी मूर्ति के सामने जो देवत्व और ब्राह्मणों का प्रतीक हो - साक्षी अपने मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखेंगे।

8.88. ‘न्यायकर्ता’ ब्राह्मण से ‘कहो’, क्षत्रिय से ‘सत्य कहो’ वैश्य से ‘असत्य कहने पर गौ, बीज और सोना चुराने का पाप लगेगा’ और शूद्र से असत्य कहने पर ‘तुम्हें उक्त या जो भी मनुष्य कर सकता है वे सभी पाप लगेंगे’ कहकर कार्य आरंभ करेगा।

8.113. ‘न्यायकर्ता’ ब्राह्मण को उसकी सत्यनिष्ठा की, क्षत्रिय को उसके अश्व या हाथी और उसके शस्त्रास्त्रों की, वैश्य को उसकी गौ, अन्न और सुवर्ण की, यांत्रिक या शूद्र व्यक्ति को उसके अपने सिर और सभी संभव अपराध की, अगर वह असत्य बोले, शपथ दिलाए।