8. हिंदू समाज के आचार-विचार - Page 251

236 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

क्यों न किए हों। वह उसे अपने राज्य से उसकी सारी संपदा सहित निष्कासित कर दे और उसके शरीर को कोई क्षति न होने दे।

11.127. क्षत्रिय वर्ग के पुण्यशील व्यक्ति की सोद्देश्य हत्या करने का पाप उस पाप का चौथाई है, जो ब्राह्मण की हत्या करने पर होता है। वैश्य की हत्या करने पर केवल आठवां और शूद्र की हत्या करने पर जो अहर्निश अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है, यह पाप सोलहवां अंश होता है।

11.128. लेकिन यदि कोई ब्राह्मण किसी क्षत्रिय की बिना किसी दुर्भावना के हत्या करता है, तब अपने समस्त धार्मिक कृत्यों को करने के बाद ब्राह्मणों को एक सांड सहित एक सहÐ गाएं दे।

11.129. या वह ब्राह्मण की हत्या करने पर की जाने वाली तपस्या को तीन वर्ष तक इंद्रियों और क्रियाओं को संयमित करते हुए करे, अपनी जटाओं को बढ़ने दे, नगर से दूर रहे, किसी पेड़ के नीचे अपना निवास बनाए।

11.130. यदि वह बिना किसी दुर्भावना के ऐसे वैश्य की हत्या करता है जिसका आचरण शुद्ध है, तब वह यही प्रायश्चित एक वर्ष तक करे या ब्राह्मणों को एक सौ गाय और एक सांड दे।

11.131. यदि किसी शूद्र की बिना किसी उद्देश्य हत्या करता है, तब वह यही प्रायश्चित करे या वह ब्राह्मणों को दस सफेद गाएं और एक सांड दे। 8.381. इस पृथ्वी पर ब्राह्मण-वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नहीं है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी न लाए।

8.126. राजा एक जैसे अपराधों की बारंबारता, उनके स्थान और समय, अपराधी के दंड का भुगतान करने या दंड को भोग सकने के सामर्थ्य और स्वयं अपराध पर विचार करने और निश्चय करने के बाद केवल उनको दंड दे, जो इसके भागी हैं।

8.124. ब्रह्मा के पुत्र मनु ने दंड के दस स्थानों को निर्दिष्ट किया है जो तीन निम्न वर्ग के व्यक्तियों के लिए उचित हैं, लेकिन इनमें से प्रत्येक में ब्राह्मण राज्य से निष्कासित कर दिया जाए।

8.125. उपस्थ (मूत्रमार्ग), पेट, जीभ, हाथ और पांचवां दोनों पैर, आंख, नाक, दोनों कान, संपत्ति और मृत्यु-दंड के मामले में संपूर्ण शरीर।

धार्मिक संस्कारों और यज्ञ-कर्म के संबंध में अधिकारों और कर्तव्यों के विषय पर मनु के विचार उल्लेखनीय हैंः