हिंदू समाज के आचार-विचार
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2.28. यह शरीर वेदाध्ययन से, धर्म का आचरण करने से, यज्ञ करने से, त्रैविद्य
नामक संस्कार से, देवताओं और पितरों का तर्पण करने से, पुत्रोत्पादन करने से,
पांच महायज्ञों से, पवित्र कर्म करने से ब्रह्म प्राप्ति के योग्य बनाया जाता है।
3.69. क्रमानुसार उक्त स्थानों पर अज्ञानवश पाप करने के कारण प्रायश्चित करने
के लिए महर्षियों ने प्रतिदिन पांच महायज्ञ करने का गृहस्थाश्रमियों के लिए विधान
किया है।
3.70. वेद का अध्ययन और अध्यापन ‘ब्रह्मयज्ञ’ है, पिंडदान और जल का तर्पण
करना ‘पितृयज्ञ’ है, हवन का ‘देवयज्ञ’ है, जीवों को चावल या अन्य अन्न देना
‘भूतयज्ञ’ है तथा अतिथियों का आदर करना ‘नृयज्ञ’ है।
3.71. यथाशक्ति इन पांच महायज्ञों को नहीं छोड़ने वाला व्यक्ति निरंतर गृहस्थाश्रम
में रहते हुए भी पंच सूना (पांच पाप) के दोषों से मुक्त रहता है।
ये सब मनु के आदेश हैं। नियम कभी भी पूर्ण नहीं होते कि सभी बातें आ जाएं। इनमें कुछ न कुछ शंका अवश्य बनी रहती है। मनु इस कमी को जानता था और उसने आपातस्थिति के आने के लिए व्यवस्था की हैः
12.108. जब कभी कोई विशेष स्थिति उत्पन्न हो जाए जो किसी नियम के अधीन
नियंत्रित न होती हो, तब कौन-सा नियम व्यवहृत किया जाए, ऐसी समस्या के
होने पर उत्तर यह है, ‘जिस नियम का ब्राह्मण भली-भांति प्रतिपादन करे, वही
नियम अकाट्य नियम समझा जाएगा।’
12.109. वे ब्राह्मण पूर्ण प्रशिक्षित हैं, जिन्होंने शास्त्रों को वेद और उनकी शाखाओं
अर्थात् वेदांग, मीसांसा, न्याय, धर्म-शास्त्रों, पुराणों का अध्ययन किया है और इनमें
से वे दृष्टांत निर्दिष्ट कर सकते हैं, जो नियमानुसार हों।
12.113. यदि अधिक ब्राह्मण एकत्र न किए जा सकें, तब एक ही ब्राह्मण का
निर्णय जो वेद के सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञाता है, सर्वोच्च सत्ता का नियम माना जाना
चाहिए, उसे नहीं जो ऐसे अनेक व्यक्तियों द्वारा व्यक्त किया गया हो, जिन्हें शास्त्रों
का ज्ञान नहीं है।
मनु के नियम शाश्वत हैं। इसलिए यह प्रश्न ही नहीं उठता कि इनमें किसी प्रकार के परिवर्तन किए जाएं। मनु के समक्ष तो केवल यह प्रश्न विचारणीय था कि इस व्यवस्था को किस प्रकार कार्यान्वित किया जाए।
8.410. राजा वैश्य वर्ण के प्रत्येक व्यक्ति को व्यापार करने, या ऋण देने, या
कृषि और पशुपालन का कार्य करने और शूद्र वर्ण को द्विजों की सेवा में रहने
के लिए आदेश दे।