9. कृष्ण और उनकी गीता - Page 256

प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता

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फ्गीता में उच्च और सुंदर भाव तो हैं, लेकिन इसके साथ कुछ दुर्बल पक्ष भी हैं। यह दुर्बल पक्ष हैं, परस्पर विरोधी उक्तियां (टीकाकारों ने जिन्हें क्षम्य समझा है और जिन्हें टीका करते समय छोड़ देने की कोशिश की है), जगह-जगह पुनरावृत्तियां, अतिशयोक्तियों, असंगतियां और नीरस उक्तियां।य्

होपकिन्स ख्1, भगवत्गीता को उसकी महत्वपूर्णता और महत्वहीनता, तर्कपूर्णता और तर्कहीनता के कारण हिंदू साहित्य की एक विलक्षण कृति मानते हैं... आदिम दार्शनिक सिद्धांतों का अटपटा समुच्चय।

वह अपना मत व्यक्त करते हुए लिखते हैंः

फ्हालांकि इस दैवी गीत में यत्र-तत्र ऊर्जा और संगीत की भव्यता है, तो भी वर्तमान काव्यकृति के रूप में यह एक अशक्त रचना है। एक ही बात को बार-बार कहा गया है। शब्दावली में और अर्थ में परस्पर विरोध के अनगिनत उदाहरण हैं, जितने कि पुनरावृत्तियों के। ये इतने अधिक हैं कि हर किसी को तब आश्चर्य होता है जब इस कृति के बारे में यह कहा जाता है कि - यह अद्भुत गीत है, जो रोमांच पैदा कर देता है।य्

होट्जमैन ख्2, कहते हैंः

फ्यह (भगवत्गीता) सर्वेश्वरवादी कविता का वैष्णव संस्करण है।य् गार्बे ख्3, लिखते हैंः

फ्इस कविता की समग्र प्रकृति विन्यास और रचना की दृष्टि से मुख्यतः आस्तिक है। कृष्ण नाम के एक इष्ट देवता मानवीय रूप में उपस्थित हो अपने मत की व्याख्या करते हैं और अपने श्रोता को यह आदेश देते हैं कि वह अपने कर्तव्यों का पालन करने के साथ-साथ सर्वप्रथम उनमें भक्ति रखे और अपने-आपको समर्पित कर दे... और इस देवता के साथ-साथ जिसे यथासंभव इष्ट रूप में व्यक्त किया गया है और जो सारी कविता में प्रमुख है - सर्वोच्च सिद्धांत के रूप में अक्सर निवर्येक्तिक तटस्थ ब्रह्म की सत्ता भी, जो परम है, स्पष्ट प्रतीत होती है। कृष्ण कभी यह कहते हैं कि मैं ही परमात्मा हूं जिसने समस्त विश्व और प्राणियों की सृष्टि की है और जो सबका नियामक है, कभी वह ब्रह्म और माया (भ्रम) के वेदांत की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि मानव प्राणी का चरम लक्ष्य इस सांसारिक भ्रम से मुक्ति पाना और ब्रह्म रूप हो जाना है। ये दोनों सिद्धांत µ ईश्वरवाद और सर्वेश्वरवाद - एक-दूसरे में मिला

  1. रिलिजन ऑफ इंडिया, पृ. 390-400

  2. गार्बे द्वारा उद्धृत

  3. इंट्रोडक्शन टू दि भगवत्गीता