242 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दिए गए हैं, एक-दूसरे का अनुगमन करते हैं, कभी एक-दूसरे से सर्वथा पृथक हो जाते हैं, और कभी ये पूरी तरह अपृथक, और कभी थोड़ा-बहुत पृथक रहते हैं। ऐसा भी नहीं है कि किसी एक को निम्न या बाह्य दिखाया गया हो और दूसरे को उच्च या गुप्त सिद्धांत। यह भी कहीं नहीं बताया गया है कि सत्य के ज्ञान के लिए ईश्वरवाद आरंभिक उपाय है या यह उसका प्रतीक है और वेदांत का सर्वेश्वरवाद स्वतः (चरम) सत्य है, लेकिन ये दोनों विचारधाराएं लगभग पूरे पाठ में इस प्रकार दिखाई गई हैं कि वस्तुतः इनमें कोई भेद नहीं है, न तो शाब्दिक और न तत्वतः।य्
श्री तेलंग ख्1, का कहना हैः
फ्गीता में कई ऐसे स्थल हैं, जिनका एक-दूसरे के साथ मेल बिठाना कठिन है और इनमें संगत बिठाने की कोई कोशिश भी नहीं की गई है। उदाहरणार्थ, अध्याय 7 के श्लोक 16 में कृष्ण अपने भक्तों को चार श्रेणियों में विभाजित करते हैं, इनमें से एक श्रेणी उनकी है जो ‘ज्ञानी’ हैं, जिनके बारे में कृष्ण कहते हैं कि वह उन्हें ‘अपना ही रूप’ मानते हैं। इस परम पद पर पहुंचे हुए व्यक्ति के बारे में कुछ कहने के लिए इससे अधिक उपयुक्त शब्दावली शायद ही मिल सकती थी। और अध्याय 6 के श्लोक 46 में हमें यह पढ़ने को मिलता है कि भक्त न केवल तपस्वी से, बल्कि ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है। भाष्यकार इस श्लोक में ‘ज्ञानी’ शब्द की इस प्रकार व्याख्या कर अपने ज्ञान का प्रदर्शन करते हैं कि ये वे व्यक्ति हैं, जिन्होंने शास्त्रों और उनके सारार्थ में ज्ञान प्राप्त कर लिया है। यह कोई ऐसी टिप्पणी नहीं है, जिस पर विचार करना आवश्यक है। यहां शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा गया है और इन परिस्थितियों में मैं इसे स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हूं। दूसरी ओर अध्याय 4 के श्लोक 39 से यह व्यक्त होता है कि भक्ति की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठतम है - यह एक उच्चतर अवस्था है, जहां भक्ति के द्वारा पहुंचा जा सकता है, भक्ति एक सोपान है। गीता में अध्याय 12 के श्लोक 12 में ध्यान को ज्ञान की तुलना में वरीयता दी गई है। मुझे ऐसा लगता है कि इसकी संगति भी अध्याय 7 के श्लोक 16 के साथ नहीं बैठती। एक और उदाहरण लीजिए। गीता में अध्याय 4 के श्लोक 14 में कहा गया है कि ईश्वर (कृष्ण) किसी के पाप या पुण्य का भागी नहीं है। लेकिन अध्याय 9 के श्लोक 24 में कृष्ण अपने को सभी यज्ञों का ‘भोक्ता और प्रभु’ बताते हैं। तब यह प्रश्न उठता है कि परमात्मा उसका भोग कैसे कर सकता है, जो उसे प्राप्त ही नहीं होता। अध्याय 9 के श्लोक 29 में पुनः कृष्ण घोषणा करते हैं कि मेरे लिए न कोई प्रिय है और न कोई अप्रिय है। लेकिन अध्याय 12 का अंतिम श्लोक तो इसके ठीक विपरीत है। इस अध्याय में अनेक श्लोक एक साथ मिलते हैं, जिनमें कृष्ण भावपूर्ण रीति से
- भगवत्गीता (एस.ई.सी.) इंट्रोडक्शन, पृ. 11