प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
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कहते दिखाए गए हैं कि ऐसा-ऐसा व्यक्ति मुझे प्रिय है। उसी प्रकार उन श्लोकों में,
जहां कृष्ण अपने आध्यात्म का सार प्रस्तुत करते हैं, वह अर्जुन से कहते हैं कि तुम
मुझे प्रिय हो। कृष्ण यह भी कहते हैं कि उन्हें वह भक्त प्रिय है, जो गीता के रहस्य
को परब्रह्म के संदर्भ में उद्घाटित करता है। ख्1, हम इस उद्धरण का कि कृष्ण को न
कोई प्रिय है न अप्रिय, अध्याय 16 के श्लोक 18 और बाद के श्लोकों में कृष्ण
की ही उक्तियों के साथ किस प्रकार मेल बिठा सकते हैं? वहां राक्षसी प्रवृत्ति वाले
लोगों के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, वह उनके प्रति किसी प्रिय भाव
का द्योतक नहीं है, जब कृष्ण कहते हैं, ‘मैं ऐसे लोगों को असुर योनि में फेंक देता
हूं, जहां से वे कष्टों और निकृष्टतम गति में जा गिरते हैं।’ ऐसे व्यक्तियों का वर्णन
उन्हें ‘न अप्रिय, न प्रिय’ कहकर करना शायद ही उचित हो। मुझे ऐसा लगता है कि
गीता में ये असंगतियां वास्तविक असंगतियां हैं और ऐसी नहीं हैं कि जिनकी व्याख्या
न की जा सके, बल्कि मेरा विचार है कि, और जैसा कि प्रो. मैक्स मूलर कहते हैं,
यह ऐसी मनःस्थिति को दिखाती है, जहां व्यक्ति सत्य के बारे में अनुमान मात्र लगा
रहा होता है, न कि उस मनःस्थिति को जहां एक पूर्ण और सुगठित दर्शन-सिद्धांत की
व्याख्या की जा रही होती है। इस बात का तनिक भी संकेत नहीं है कि लेखक को
इन असंगतियों की जानकारी है। जैसा कि विभिन्न उद्धरणों से पता चलता है, और मैं
इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं, किसी प्रसंग-विशेष पर विचार करते समय कुछ अर्द्धसत्यों
को इधर और कुछ उधर बिखेर दिया गया है। लेकिन इन विभिन्न अर्द्धसत्यों को, जो
स्पष्टतः एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, एक जगह सुव्यवस्थित करने का कोई प्रयास
नहीं किया गया है। अगर ऐसा किया गया होता, तब ये सारी की सारी असंगतियां
विलीन हो गई होतीं।य्
यह विचार उन विचारकों के हैं, जिन्हें आधुनिक कहा जा सकता है। अगर हम पुराने रूढि़वादी पंडितों के विचारों को पढ़ें, तब हमें भिन्न-भिन्न मत मिलेंगे। एक मत यह है कि भगवत्गीता किसी विशेष धार्मिक संप्रदाय का ग्रंथ नहीं है, और इसमें मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों का समान रूप से निर्वचन किया गया है। ये मार्ग हैं - (1) कर्म मार्ग, (2) भक्ति मार्ग, और (3) ज्ञान मार्ग। यह ग्रंथ मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों की उपयोगिता का उपदेश देता है। ये पंडितगण अपने इस मत की पुष्टि में कि गीता में प्रत्येक मार्गों की उपयोगिता को स्वीकार किया गया है, यह कहते हैं कि इस ग्रंथ के 18 अध्यायों में से अध्याय 1 से 6 तक ज्ञान मार्ग, अध्याय 7 से 12 तक कर्म मार्ग और अध्याय 12 से 18 तक भक्ति मार्ग का उपदेश मिलता है। इनकी यह धारणा है कि गीता मोक्ष प्राप्ति के तीनों ही मार्गों को उचित बताती है।
- अध्याय 7 के श्लोक 17 को भी देखिए, जहां कृष्ण को ज्ञानवान व्यक्ति प्रिय बताया गया है।