244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इन पंडितों के दृष्टिकोण से नितांत भिन्न दृष्टिकोण शंकराचार्य और श्री तिलक का है। दोनों ही विद्वानों को परंपरावादी लेखकों की श्रेणी में रखा जा सकता है। शंकराचार्य का दृष्टिकोण यह था कि भगवत्गीता में ज्ञान मार्ग का उपदेश दिया गया है और ज्ञान मार्ग ही मोक्ष का एकमात्र सही मार्ग है। श्री तिलक ख्1, अन्य विद्वानों में से किसी विद्वान के दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं। वे इस दृष्टिकोण का खंडन करते हैं कि गीता में अनेक विसंगतियां हैं। वे उन पंडितों से भी सहमत नहीं हैं जो कहते हैं कि भगवत्गीता मोक्ष के तीन मार्गों को उचित मानती हैं। शंकराचार्य के समान उनका अभिमत है कि भगवत्गीता निश्चित सिद्धांत के बारे में उपदेश देती है। परंतु उनका मत शंकराचार्य से भिन्न है और उनकी धारणा है कि गीता ने कर्म योग का नहीं, बल्कि ज्ञान योग का उपदेश दिया है।
गीता में जो कुछ कहा गया है, उसके बारे में इतने भिन्न-भिन्न मतों का होना केवल आश्चर्य की बात नहीं है। कोई भी व्यक्ति यह पूछ सकता है कि विद्वानों में इतना मतभेद क्यों है? इस प्रश्न के उत्तर में मेरा निवेदन है कि विद्वानों ने ऐसे लक्ष्य की खोज की है जो मिथ्या है। वे इस अनुमान पर भगवत्गीता के संदेश की खोज करते हैं कि कुरान, बाइबिल अथवा धम्मपद के समान गीता भी किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रतिपादन करती है। मेरे मतानुसार यह अनुमान ही मिथ्या है। भगवत्गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, इसलिए उसमें कोई संदेश नहीं है और इसमें किसी संदेश की खोज करना व्यर्थ है। निस्संदेह यह प्रश्न पूछा जा सकता हैः यदि भगवत्गीता कोई ईश्वरीय वाणी नहीं है, तो फिर यह क्या है? मेरा उत्तर है कि भगवत्गीता न तो धर्म ग्रंथ है, और न ही यह दर्शन का ग्रंथ है। भगवत्गीता ने दार्शनिक आधार पर धर्म के कतिपय सिद्धांतों की पुष्टि की है। यदि कोई व्यक्ति इस आधार पर भगवत्गीता को धर्मग्रंथ अथवा दर्शन का ग्रंथ कहता है, तो वह अपने मुंह मियां मिट्टòन्न् बन सकता है। परंतु यह वस्तुतः दोनों में से एक भी नहीं है। इस ग्रंथ में दर्शन का प्रयोग धर्म की पुष्टि के लिए किया गया है। मेरे प्रतिद्वंद्वी केवल राय बताने से ही संतुष्ट नहीं होंगे। वे इस बात पर बल देंगे कि मैं अपनी स्थापना को विशिष्ट तथ्यों का संदर्भ देकर सिद्ध करूं। यह कोई कठिन बात नहीं है। वास्तव में यह सबसे सरल कार्य है।
भगवत्गीता का अध्ययन करने पर सबसे पहली बात जो हमें मिलती है, वह यह कि इसमें युद्ध को संगत ठहराया गया है। स्वयं अर्जुन ने युद्ध तथा संपत्ति के लिए लोगों की हत्या करने का विरोध किया। कृष्ण ने युद्ध तथा युद्ध में हत्याओं की दार्शनिक आधार पर पुष्टि की। युद्ध की यह दार्शनिक पुष्टि भगवत्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 2 से 28 तक दी गई है। युद्ध की दार्शनिक पुष्टि तर्क की दो कसौटियों पर आधारित है। पहला तर्क यह है कि संसार नश्वर है तथा मनुष्य मृत्युधर्मी है। वस्तुओं का अंत होना निश्चित
- देखिए, गीता रहस्य (दूसरा संस्करण), खंड 2, अध्याय 14, स्फुट