प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
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है। मनुष्य की मृत्यु निश्चित है। जो बुद्धिमान हैं, उनके लिए इस बात से क्या अंतर पड़ेगा कि मनुष्य की स्वाभाविक मृत्यु होती है अथवा वह हिंसा के फलस्वरूप मृत्यु को प्राप्त करता है? जीवन अस्वाभाविक है, इस बात पर आंसू क्यों बहाए जाएं कि उसका अंत हो गया है? मृत्यु अनिवार्य है, फिर इस बात पर क्यों विचार किया जाए कि मृत्यु किस प्रकार हुई? दूसरा तर्क प्रस्तुत करते हुए युद्ध की आवश्यकता को सिद्ध किया गया है और यह सोचना भ्रम है कि शरीर और आत्मा एक हैं। वे अलग-अलग हैं। वे केवल स्पष्ट रूप से अलग-अलग ही नहीं, परंतु वे दोनों अलग-अलग इसलिए हैं कि शरीर नश्वर है, जब कि आत्मा अमर और अविनाशी है। जब मृत्यु होती है तो शरीर का अंत हो जाता है। आत्मा का कभी भी विनाश नहीं होता। और आत्मा कभी भी नहीं मरती, यहां तक कि वायु इसे सुखा नहीं सकती, अग्नि इसे जला नहीं सकती और हथियार इसे काट नहीं सकते। इसलिए यह कहना भूल है कि जब व्यक्ति मर जाता है, तो उसकी आत्मा भी मर जाती है। वास्तव में स्थिति यह है कि शरीर मर जाता है। उसकी आत्मा मृत शरीर को उसी प्रकार त्याग देती है, जैसे व्यक्ति अपने पुराने वस्त्रों को त्याग देता है - वह नए वस्त्र धारण करता है तथा अपना जीवन बिताता है। चूंकि आत्मा कभी भी नहीं मरती है, अतः व्यक्ति की हत्या होने से उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए युद्ध और हत्या-जनित पश्चाताप अथवा संकोच, यही भगवत्गीता का तर्क है।
एक अन्य सिद्धांत जिसे भगवत्गीता में प्रस्तुत किया गया है, वह चातुर्वर्ण्य की दार्शनिक पुष्टि है। निस्संदेह भगवत्गीता में बताया गया है कि चातुर्वर्ण्य ईश्वर का सृजन है और इसलिए यह अति पवित्र है। परंतु गीता में यह इस कारण वैध नहीं बताया गया है। इसके लिए दार्शनिक आधार प्रस्तुत किया गया है तथा इसे मनुष्य के स्वाभाविक और जन्मजात गुणों के साथ जोड़ दिया गया है। भगवत्गीता में कहा गया है कि पुरुष के वर्ण का निर्धारण मनमाने ढंग से नहीं हुआ है। परंतु उसका निर्धारण मनुष्य के स्वाभाविक और जन्मजात गुणों ख्1, के आधार पर किया जाता है।
भगवत्गीता में तीसरा सिद्धांत कर्म योग की दार्शनिक पृष्ठभूमि बताकर प्रस्तुत किया गया है। भगवत्गीता के अनुसार कर्म मार्ग का अर्थ है मोक्ष के लिए यज्ञ आदि संपन्न करना। भगवत्गीता में कर्म योग का प्रतिपादन किया गया है और इस हेतु उन बातों का निराकरण किया गया है जो अनावश्यक रूप से कर्मयोग में पैदा हो गई हैं, जिन्होंने उसे ढक दिया है और विकृत कर दिया है। पहली बात है, अंधविश्वास। गीता का उद्देश्य कर्म योग की आवश्यक शर्त के रूप में बुद्धि योग ख्2, के सिद्धांत का निरूपण कर उस अंधविश्वास को समाप्त करना है। यदि व्यक्ति स्थित प्रज्ञ, अर्थात् संयत बुद्धि हो जाए तो कर्मकांड करना कोई गलत बात नहीं है। दूसरा दोष यह है कि कर्मकांड के
भगवत्गीता, 4.13
वही, 2, 39-53