246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पीछे स्वार्थ निहित था और यही स्वार्थ कर्म-संपादन के लिए प्रेरणा रहा। इस दोष के निराकरण के लिए भगवत्गीता में अनासक्ति, अर्थात् कर्म के फल की इच्छा किए बिना कर्म ख्1, के संपादन के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। गीता में कर्म मार्ग ख्2, की पुष्टि यह तर्क प्रस्तुत करके की गई है कि अगर इसके मूल में बुद्धि योग हो और कर्म के कारण किसी फल की इच्छा की भावना न हो, तो कर्मकांड के सिद्धांत में कोई त्रुटि नहीं है। इसी क्रम में अन्य सिद्धांतों के संबंध में विचार करना उचित ही है कि गीता में दार्शनिक आधार पर इनकी पुष्टि किस प्रकार की गई है, जो पहले अस्तित्व में ही नहीं थे। परंतु यह तभी हो सकता है, यदि कोई व्यक्ति भगवत्गीता पर कोई शोध प्रबंध लिखे। यह इस अध्याय के कार्य-क्षेत्र के परे की बात है, क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारतीय साहित्य में गीता के समुचित महत्व का आकलन करना है। इसलिए मैंने मुख्य-मुख्य सिद्धांतों को चुना है, ताकि मैं अपनी व्याख्या की पुष्टि कर सकूं। निश्चित ही मेरी व्याख्या को लेकर दो और प्रश्न हो सकते हैं। भगवत्गीता में जिन सिद्धांतों की दार्शनिक पुष्टि की गई है, वे किन व्यक्तियों के हैं? भगवत्गीता के लिए इन सिद्धांतों की पुष्टि करना क्यों आवश्यक हो गया था?
प्रथम प्रश्न से प्रारंभ किया जाए। गीता में जिन सिद्धांतों की पुष्टि की गई है, वे प्रतिक्रांति के सिद्धांत हैं जो प्रतिक्रांति की बाइबिल, अर्थात् जैमिनि कृत पूर्वमीमांसा में वर्णित हैं। इस तर्क को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। यदि कोई कठिनाई है, तो यह मुख्यतः कर्म योग शब्द का गलत अर्थ करने से संबंधित है। भगवत्गीता के अधिकांश भाष्यकार ‘कर्म योग’ शब्द का अनुवाद ‘कार्य’ और ‘ज्ञान योग’ शब्द का अनुवाद ‘ज्ञान’ करते हैं और भगवत्गीता पर यह समझकर विचार करते हैं कि इसमें सामान्य रूप में ज्ञान और कर्म में तुलना और उनके अंतर का विवेचन किया गया है। यह बिल्कुल गलत है। भगवत्गीता का उद्देश्य कर्म बनाम ज्ञान विषय पर कोई सामान्य या दार्शनिक चर्चा करना नहीं है। वास्तव में गीता का संबंध विशेष विषय से है, सामान्य विषय से नहीं है। कर्मयोग अथवा कर्म के बारे में गीता का आशय उन सिद्धांतों से है, जो जैमिनि के कर्मकांड में दिए गए हैं और ज्ञान योग अथवा ज्ञान का आशय उन सिद्धांतों से है, जो बादरायण के ब्रह्म सूत्र में दिए गए हैं। गीता में कर्म की चर्चा का आशय कर्म या अकर्म, निवृत्तिवाद या प्रवृत्तिवाद से नहीं है, सामान्य अर्थ में इस चर्चा का आशय धार्मिक अनुष्ठान तथा उनके पालन से है, और जिसने भी गीता को पढ़ा है, वह इस बात से इंकार नहीं करेगा। गीता को एक ऐसे दल की प्रचार सामग्री (पेम्फलेट) के स्तर से ऊंचा उठाकर लिखने का प्रयास किया गया, जो क्षुद्र विवाद में उलझ गया था और जिससे ऐसा लगे कि वह उच्च दर्शन के विषयों पर लिखा गया कोई अच्छा-खासा भाष्य हो। इसलिए कर्म और ज्ञान शब्दों के अर्थ का
भगवत्गीता, 2, 47
यह भगवत्गीता, 2, 48 में निष्कर्ष के रूप में मिलता है।