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प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता

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विस्तार किया गया और इन्हें सामान्य शब्दों के रूप में ग्रहीत किया गया। देशभक्त भारतीयों के इस रहस्य के लिए मुख्य दोष श्री तिलक को दिया जाना चाहिए। इसका परिणाम यह हुआ कि इन गलत अर्थों ने लोगों को भ्रम में डाल दिया और वे यह विश्वास करने लगे कि भगवत्गीता एक स्वतंत्र स्वतः पूर्ण ग्रंथ है तथा इसका उस साहित्य से कोई संबंध नहीं है, जो इस ग्रंथ से पूर्व था। परंतु यदि कोई व्यक्ति कर्म योग शब्द के अर्थ को वैसा ही ग्रहण करना चाहता है, जैसा कि भगवत्गीता में दिया गया है, तो वह व्यक्ति इस बात से सहमत हो जाएगा कि भगवत्गीता में कर्म योग के बारे में कोई अन्य बात नहीं कही गई है, परंतु वहां आशय कर्मकांड के उन सिद्धांतों से है, जिनका प्रतिपादन जैमिनि द्वारा किया गया था तथा जिन्हें गीता द्वारा पुनर्जीवित और पुष्ट करने का प्रयास किया गया है।

अब दूसरे प्रश्न पर विचार किया जाए। भगवत्गीता में प्रतिक्रांति के सिद्धांतों की पुष्टि करना क्यों आवश्यक समझा गया? मैं सोचता हूं कि इसका उत्तर सरल है। यह इसलिए किया गया जिससे इन सिद्धांतों की बौद्ध धर्म के जबरदस्त प्रभाव से रक्षा की जा सके और यही कारण है कि भगवत्गीता की रचना की गई। बुद्ध ने अहिंसा का उपदेश दिया। उन्होंने अहिंसा का उपदेश ही नहीं दिया, अपितु ब्राह्मणों को छोड़कर अधिकांश लोगों ने अहिंसा को जीवन-शैली के रूप में स्वीकार भी कर लिया था। उनके मन में हिंसा के प्रति घृणा पैदा हो चुकी थी। बुद्ध ने चातुर्वर्ण्य के विरुद्ध उपदेश दिए। उन्होंने चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत का खंडन करने के लिए बड़ी कटु उपमाएं दीं। चातुर्वर्ण्य का ढांचा चरमरा गया। चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था उलट-पुलट थी। शूद्र और महिलाएं संन्यासी हो सकते थे, ये ऐसी प्रतिष्ठा थी, जिससे प्रतिक्रांति ने उन्हें वंचित कर दिया। बुद्ध ने कर्मकांड और यज्ञ कर्म की भर्त्सना की। उन्होंने इस आधार पर भी उनकी भर्त्सना की कि इन कर्मों के पीछे अपनी स्वार्थ-सिद्धि की भावना छिपी हुई थी। इस आक्रमण के विरुद्ध प्रतिक्रांतिवादियों का क्या उत्तर था? केवल यही कि ये बातें वेदों के आदेश हैं, वेद भ्रमातीत है, अतः इन सिद्धांतों के बारे में शंका नहीं की जानी चाहिए।

बौद्ध-काल में, जो भारत का सबसे अधिक प्रबुद्ध और तर्कसम्मत युग था, ऐसे सिद्धांतों के लिए कोई स्थान नहीं था, जो अविवेक, दुराग्रह, तर्कहीन और अस्थिर धारणाओं पर आश्रित हों। जो लोग अहिंसा पर उसे एक जीवन-शैली मानकर विश्वास करने लगे थे और जो उसे जीवन में नियम के रूप में अपना चुके थे, उनसे इस सिद्धांत को स्वीकार करने की आशा किस प्रकार की जा सकती थी कि हत्या करने पर क्षत्रिय को पाप इसलिए नहीं लग सकता क्योंकि वेदों में ऐसा करना उसका कर्तव्य बताया गया है। जिन लोगों ने सामाजिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था तथा जो व्यक्ति के गुणों के आधार पर समाज का पुनर्निमाण कर रहे थे, वे श्रेणीबद्ध करने वाले चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत और केवल जन्म के आधार पर व्यक्तियों के वर्गीकरण को क्यों स्वीकार करते, क्योंकि वेदों ने ऐसा कहा है? जिन लोगों ने बुद्ध के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था