9. कृष्ण और उनकी गीता - Page 263

248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि समाज में सभी दुःख तृष्णा के कारण हैं, अथवा जिसे संग्रह की प्रवृत्ति कहा जाता है, वे उस धर्म को क्यों स्वीकार करते जो लोगों को यज्ञादि कर्म (बलि) से लाभ प्राप्ति करने के लिए इसलिए प्रेरित करता है कि ऐसा करना वेद-सम्मत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बौद्ध धर्म के तेजी से बढ़ते प्रभाव से जैमिनि के प्रतिक्रांति सिद्धांत डगमगा उठे थे और वे चकनाचूर हो जाते, यदि उन्हें भगवत्गीता का समर्थन न प्राप्त होता, और जो उन्हें भगवत्गीता से मिला भी था। भगवत्गीता द्वारा दिए गए प्रतिक्रांतिवादी सिद्धांतों की दार्शनिक पुष्टि किसी भी प्रकार से अकाट्य नहीं है। भगवत्गीता द्वारा इस बात की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करना, कि क्षत्रिय का कर्तव्य हत्या करना है, एक बचकानी बात है। यह कहना कि हत्या करना हत्या नहीं है, क्योंकि जिसकी हत्या की जाती है, वह शरीर की है, और वह आत्मा की नहीं है। यह हत्या-कर्म का ऐसा बचाव है, जिसे कभी भी नहीं सुना गया है। यदि कृष्ण को अपने उस मुवक्किल की ओर से अधिवक्ता के रूप में उपस्थित होना पड़ता जिस पर हत्या का मुकदमा चलाया जा रहा है और वे भगवत्गीता में बताए गए सिद्धांत को उस अपराधी के बचाव के लिए प्रस्तुत करते, तो इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि उन्हें पागलखाने में भेज दिया जाता। इसी प्रकार भगवत्गीता में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के सिद्धांत की पुष्टि करना भी बचकाना कार्य है। कृष्ण इस सिद्धांत की पुष्टि सांख्य के गुण सिद्धांत के आधार पर करते हैं। परंतु कृष्ण को अपनी त्रुटि का अनुभव नहीं होता। चातुर्वर्ण्य में चार वर्ण होते हैं, परंतु सांख्य के अनुसार गुणों की संख्या तीन है। चार वर्णों की व्यवस्था को उस दर्शन पर किस प्रकार आधारित किया जा सकता है, जिसमें तीन से अधिक वर्णों को मान्यता ही नहीं दी गई है? भगवत्गीता में प्रतिक्रिया के सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करने के लिए जो यह सारा प्रयास किया गया है, वह बहुत ही बचकाना है और इसके बारे में एक क्षण भी गंभीर रूप में विचार करने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी इसमें संदेह नहीं है कि भगवत्गीता की सहायता के बिना प्रतिक्रांति अपने सिद्धांतों की निस्सारता के कारण कभी भी समाप्त हो गई होती। भगवत्गीता की यह भूमिका क्रांतिकारियों को चाहे जितनी भी शरारतपूर्ण लगे, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि भगवत्गीता ने प्रतिक्रांति को पुनर्जीवन प्रदान किया और यदि प्रतिक्रांति आज भी जीवित है तो यह उस दार्शनिक पुष्टि के आडंबर के कारण है, जो इसे भगवत्गीता से प्राप्त हुई है - यह सब कुछ वेद-विरुद्ध और यज्ञ-विरुद्ध है। जैसा कि भगवत्गीता के अन्य अंशों से यह बात विदित होगी कि वेदों और शास्त्रों (16.23-24ः 17.11-13.24) के प्राधिकार के विरुद्ध नहीं है। यह यज्ञ (3.9-15) की अनिवार्यता के विरुद्ध नहीं है। यह दोनों के महत्व को पुष्ट करती है। इस प्रकार जैमिनि की पूर्व-मीमांसा और भगवत्गीता में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं है। यदि कुछ विशेष बात है तो यह कि भगवत्गीता अधिक दृढ़ता से प्रतिक्रांति का समर्थन करती है, जब कि जैमिनि कृत पूर्व-मीमांसा ने इतना समर्थन नहीं किया है। यह विशिष्ट इसलिए है कि यह प्रतिक्रांति को दार्शनिक सिद्धांत देती है ओर इसलिए उसका आधार स्थाई है, जैसा कि पहले कभी नहीं था और उसके बिना