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प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता

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प्रतिक्रांति का अस्तित्व बना रहना भी संभव नहीं था। जैमिनि की पूर्व-मीमांसा की तुलना में भगवत्गीता की दार्शनिक पुष्टि अधिक विशिष्ट है, और भगवत्गीता का यह दार्शनिक समर्थन है जो प्रतिक्रांति के केंद्रीय सिद्धांत, अर्थात् चातुर्वर्ण्य को प्रदान करती है। चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत की पुष्टि तथा व्यवहार में उसका अनुपालन ही भगवत्गीता की मूल भावना प्रतीत होती है। कृष्ण यह कहकर संतुष्ट नहीं होते कि चातुर्वर्ण्य गुण-कर्म पर आधारित हैं और वह इससे भी आगे बढ़ जाते हैं और दो आदेश देते हैं। पहला आदेश अध्याय 3, श्लोक 26 में दिया गया है। कृष्ण कहते हैंः ज्ञानी व्यक्ति को प्रतिवाद कर अज्ञानी व्यक्ति के मन में संदेह उत्पन्न नहीं करना चाहिए जो कर्मकांड का अनुसरण करता हो, जिसमें निश्चय ही चातुर्वर्ण्य के नियम भी सम्मिलित हैं। अर्थात् हमें लोगों को उत्तेजित नहीं करना चाहिए कि कहीं वे कर्मकांड के सिद्धांत और उसमें शामिल अन्य बातों के विरोध में न उठ खड़े हों। दूसरा आदेश भगवत्गीता के अध्याय 18, श्लोक 41-48 में दिया गया है। इसमें कृष्ण ने कहा है कि प्रत्येक को अपने वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्य करना चाहिए और उन्हें अन्य कोई कर्तव्य नहीं करना चाहिए तथा वह उन लोगों को चेतावनी देते हैं, जो उनकी पूजा करते हैं तथा उनके भक्त हैं कि ये लोग केवल भक्ति करने से ही मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकेंगे, बल्कि इसके लिए उन्हें भक्ति के साथ उन कर्तव्यों को भी करना होगा, जो उनके वर्ण के लिए भी निर्धारित हैं। संक्षेप में, शूद्र चाहे कितना ही महान भक्त क्यों न हो, यदि उसने शूद्र के कर्तव्य का उल्लंघन किया है, अर्थात् उसने उच्च वर्गों के लोगों की सेवा में जीवनयापन नहीं किया है, तो उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होगा। मेरी दूसरी स्थापना यह है कि भगवत्गीता का मुख्य आशय जैमिनि को नया समर्थन देना था और इसके कम से कम वे अंश जो जैमिनि के सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि करते हैं, वे जैमिनि की पूर्व-मीमांसा के बाद और जब जैमिनि के सिद्धांत कार्यान्वित हो चुके थे, तब लिखे गए थे। मेरी तीसरी स्थापना यह है कि बौद्ध धर्म के क्रांतिकारी और तार्किक विचारों के प्रहार के फलस्वरूप भगवत्गीता के द्वारा प्रतिक्रांति के सिद्धांतों की दार्शनिक आधार पर पुष्टि की जानी आवश्यक हो गई थी।

अब मैं उन आपत्तियों को लेता हूं, जो मेरी स्थापनाओं की वैधता के संबंध में उठाई जा सकती हैं। मुझसे कहा जा सकता है कि जो मैं यह कहता हूं कि भगवत्गीता का प्रणयन-काल बौद्ध धर्म और जैमिनि की पूर्व-मीमांसा के बाद का है, वह केवल अनुमान है और इस अनुमान के पीछे कोई प्रमाण नहीं है। मैं इस तथ्य से अवगत हूं कि मेरी स्थापना अधिकांश भारतीय विद्वानों के द्वारा स्वीकृत दृष्टिकोण के विपरीत है जिनका आग्रह यह स्वीकार करने में है कि भगवत्गीता की रचना अतिप्राचीन-काल की है और यह बौद्ध धर्म तथा जैमिनि से पूर्ववर्ती है, न कि इस बात की खोज करने में है कि भगवत्गीता का संदेश क्या है और मानव-जीवन के मार्गदर्शक के रूप में उसका क्या मूल्य है। यह बात विशेषकर श्री तेलंग और श्री तिलक के बारे में खरी उतरती है। परंतु