9. कृष्ण और उनकी गीता - Page 265

250 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जैसा कि गार्बे ख्1, ने लिखा है - फ्तेलंग के लिए जैसा कि प्रत्येक हिंदू के संबंध में है जो चाहे कितना ही प्रबुद्ध क्यों न हो, भगवत्गीता को अतिप्राचीन समझना, आस्था की बात है और जहां यह भावना प्रबल हो, वहां आलोचना हो ही नहीं सकती।य्

प्रोफेसर गार्बे कहते हैंः

फ्गीता के प्रणयन काल को निश्चित करने का कार्य प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा,

जिसने इस समस्या को हल करने का निष्ठापूर्वक प्रयत्न किया है, एक बहुत ही

कठिन कार्य कहा गया है और यह कठिनाई (हर तरह से) तब और भी बढ़ जाती

है, जब इस समस्या को दुहरे रूप में प्रस्तुत किया जाता है, अर्थात् मूल गीता के

प्रणयन-काल के साथ-साथ उसके संशोधन करने के समय को भी निश्चित करना।

मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस मामले में प्रायः हम किसी निश्चित

निर्णय पर न पहुंच कर केवल संभावनाओं पर ही पहुंच सकेंगे।य्

ये संभावनाएं क्या हैं? मुझे कोई संदेह नहीं कि ये संभावनाएं मेरे शोध प्रबंध के पक्ष में हैं। वास्तव में, मैं जितना विचार कर सकता हूं, उनके विरुद्ध कुछ भी नहीं है। इस प्रश्न की जांच करने में सर्वप्रथम गीता से ही सीधा साक्ष्य प्रस्तुत करता हूं, जिसमें यह बताया गया है कि गीता का प्रणयन जैमिनि की पूर्व-मीमांसा और बौद्ध धर्म के बाद हुआ।

भगवत्गीता का अध्याय 3, श्लोक 9-13 का विशेष महत्व है। इस संबंध में यह सत्य है कि भगवत्गीता में जैमिनि नाम का कोई संदर्भ नहीं दिया गया है, न मीमांसा का नाम ही दिया गया है। परंतु क्या इसमें कोई संदेह है कि भगवत्गीता के अध्याय 3, श्लोक 9-18 में उन सिद्धांतों का वर्णन है, जो जैमिनि की पूर्व-मीमांसा में दिए गए हैं? यहां तक कि श्री तिलक ख्2, भी, जो भगवत्गीता की प्राचीनता में विश्वास करते हैं, यह स्वीकार करते हैं कि भगवत्गीता, पूर्व-मीमांसा के सिद्धांतों का परीक्षण करती है। इस तर्क को प्रस्तुत करने का एक अन्य तरीका है। जैमिनि ने शुद्ध और सरल कर्म योग का उपदेश दिया है। दूसरी ओर भगवत्गीता ने अनासक्ति कर्म का उपदेश किया है। इस प्रकार गीता एक ऐसे सिद्धांत का उपदेश देती है, जिसे आमूल संशोधित कर दिया गया है। भगवत्गीता कर्म योग में संशोधन ही नहीं करती, अपितु कुछ कठोर शब्दों ख्3, में शुद्ध और सरल कर्म योग के समर्थकों की आलोचना करती है। यदि गीता जैमिनि से पूर्व का ग्रंथ है, तो पाठक जैमिनि से यह आशा करेगा कि वह भगवत्गीता की आलोचना करते और समुचित उत्तर देते, परंतु हमें भगवत्गीता के इस अनासक्ति कर्म योग के संबंध में जैमिनि में कोई संदर्भ नहीं मिलता। ऐसा क्यों है? इसका यही

  1. इंट्रोडक्शन (इंडियन एंटीक्वैरी परिशिष्टांक) भूमिका, पृ. 30

  2. गीता रहस्य, खंड 2, पृ. 916-922

  3. भगवत्गीता, 2, 42-46 और 18.66