9. कृष्ण और उनकी गीता - Page 267

252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उल्लेखनीय समानता के सदंर्भ में बहुत ही रोचक है, जिसके बारे में हमने अपने अनुवाद की पाद-टिप्पणियों में ध्यान आकृष्ट किया है। लेकिन इस प्रश्न को हल करने के लिए दुर्भाग्य से अपेक्षित तथ्य नहीं मिलते। यह अवश्य है कि प्रो. विल्सन का विचार है कि गीता ख्1, में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के चिह्न मिलते हैं लेकिन उनकी यह धारणा बौद्धों और चार्वाकों या भौतिकवादियों के बीच पाए जाने वाले मतभेद पर आश्रित थी। ख्2, इस संदर्भ के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विश्वसनीय प्रमाण नहीं है। गीता में बौद्ध धर्म का उल्लेख नहीं है, यह एक ‘नकारात्मक तर्क’ है और अपर्याप्त है। यह तर्क मेरे विचार से, संतोषजनक भी नहीं है, हालांकि जैसा कि मैंने अन्यत्र कहा है ख्3,, ‘गीता में जो कुछ कहा गया है उनमें से कुछ बातें बौद्ध धर्म के समनुरूप हैं।’ हालांकि गीता में उसके पूर्ववर्ती विचारकों के चिह्न प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में मिलते हैं, लेकिन इस प्रश्न के तथ्यों के बारे में एक दृष्टिकोण ऐसा है, जो मेरे विचार में उस निष्कर्ष की पुष्टि करता है, जिस पर उक्त नकारात्मक तर्क के द्वारा पहुंचा जा सकता है। बुद्ध जिन तथ्यों के कारण ब्राह्मण धर्म का विरोध करते हैं, वह वेदों के वास्तविक अधिकार और वर्णों में अंतर के बारे में सही दृष्टिकोण को लेकर हैं। सैद्धांतिक चिंतन के अनेक क्षेत्रों में बौद्ध धर्म अभी भी पुराने ब्राह्मणवाद का एक रूप है। ख्4, यह विभिन्न समनुरूपताओं के आधार पर, जिनकी ओर हमने ध्यान आकृष्ट किया है, स्पष्ट हो जाता है। अब इन दोनों आधारों पर गीता स्वतः उन विचारों के प्रति प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करती है, जो उसके रचना-काल के समय विद्यमान था। बौद्ध धर्म की तरह गीता वेदों को पूर्णतः अस्वीकृत नहीं करती, बल्कि उन्हें एक ओर टिका देती है। गीता वर्ण-व्यवस्था का उन्मूलन नहीं करती। यह वर्ण व्यवस्था को कुछ कम निराधार बताती है। इसलिए इन दोनों अनुमानों में से एक अनुमान इन तथ्यों के आधार पर युक्तियुक्त लगता है। या तो गीता और बौद्ध धर्म, दोनों एक ही और समनुरूप आध्यात्मिक क्रांति की अभिव्यक्ति हैं जिसने उस समय के धर्म के ढांचे को हिला दिया था, इसमें गीता आरंभ की स्थिति या इस क्रांति का आरंभिक रूप थी या बौद्ध धर्म ब्राह्मणवाद पर हावी होने लगा था और गीता उसे पुष्ट करने का एक प्रयास थी, अर्थात् गीता में उन पक्षों पर ध्यान दिया गया जो निर्बल थे, निर्बलतर पक्ष पहले ही त्यागे जा चुके थे। मैं बाद वाली स्थिति को स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि हालांकि गीता का रचनाकार वेदों की सत्ता को चुनौती देता है, तो भी गीता में प्राचीन हिंदू व्यवस्था पर सशक्त प्रहार के प्रति कोई समर्थन के संकेत नहीं मिलते।

  1. एसेज ऑन संस्कृत लिटरेचर, खंड 3, पृ. 150

  2. इस बारे में इंट्रोडक्टरी एसेज टू अवर गीता इन वर्स, पृ. 11 पर क्रमशः हमारा मत देखें।

  3. इंट्रोडक्शन टू गीता इन इंग्लिश वर्स, पृ. 5 क्रमशः

  4. मैक्स मूलर के हिब्बर्ट लैक्चर्स, पृ. 137, वेबर्स इंडियन लिटरेचर, पृ. 288-89, राइस डेविड्स का बुद्ध

धर्म पर उत्कृष्ट लघु ग्रंथ, पृ. 151 और डेविड की पुस्तक का पृ. 83 भी देखें।