प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
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इसके अलावा यह बात भी है कि ऐसा करते समय वह वही करता है, जो उसके पहले किया गया, या जो उसके समकालिक कर रहे थे। ये तथ्य उक्त नकारात्मक तर्क के निष्कर्ष को पुष्ट करते हैं। मेरे विचार में बौद्ध धर्म उच्च आध्यात्मिक विषयों पर वैसी ही अभिव्यक्ति है, जैसी कि हमें उपनिषद और गीता में मिलती है। ख्1,
मैंने इस उद्धरण को पूरा-पूरा इसलिए उद्धृत किया है कि ऐसा ही सभी हिंदू विद्वानों का मत है। उनमें से कोई भी यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि भगवत्गीता किसी भी रूप में बौद्ध धर्म से प्रभावित है। ये विद्वान इसे अस्वीकार करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं कि गीता ने बौद्ध धर्म से कुछ ग्रहण किया है। यही दृष्टिकोण प्रो. राधाकृष्णन का और श्री तिलक का भी है। जब कभी भगवत्गीता और बौद्ध धर्म में बहुत अधिक विचारों के साम्य होने की बात उठती है, तब उसे अस्वीकार कर दिया जाता है, और यह तर्क दिया जाता है कि यह उपनिषदों से ग्रहण किया गया है। यह प्रतिक्रांतिकारियों की ठेठ निम्न कोटि की वृत्ति है कि वे बौद्ध धर्म को कोई भी श्रेय नहीं प्रदान करना चाहते।
इस मनोवृत्ति से उन सभी को भारी दुःख पहुंचता है, जिन्होंने भगवत्गीता और बौद्ध सुत्तों का तुलनात्मक अध्ययन किया है, क्योंकि यदि इस कथन में कोई सत्यता है कि गीता में सांख्य दर्शन भरा हुआ है, तो इस कथन में उससे भी अधिक सत्यता है कि गीता बौद्ध विचारों से भरी हुई है। ख्2, यह समानता केवल विचारों में ही नहीं, बल्कि भाषा में भी है। यह कुछेक उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा कि यह कहां तक सच है।
भगवत्गीता में ब्रह्म-निर्वाण ख्3, पर विवेचन किया गया है। कोई व्यक्ति ब्रह्म-निर्वाण तक किन साधनों से होकर पहुंच सकता है, वे भगवत्गीता में इस प्रकार बताए गए हैंः (1) श्रद्धा (अपने में विश्वास), (2) व्यवसाय (दृढ़ निश्चय), (3) स्मृति (लक्ष्य का स्मरण), (4) समाधि (मन लगाकर चिंतन), और (5) प्रज्ञा (अंतर्दृष्टि या यथातथ्य ज्ञान)।
गीता ने निर्वाण सिद्धांत कहां से लिया? निश्चय ही यह सिद्धांत उपनिषदों से नहीं लिया गया है, क्योंकि किसी भी उपनिषद में निर्वाण शब्द का उल्लेख नहीं है। यह
- तुलना कीजिए वेबर की हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर, पृ. 285। श्री डेविड की पुस्तक बुद्धिज्म में
पृ. 94 पर हमें प्रामाणिक बौद्ध कृति से संदर्भ मिलता है, जिसमें आत्मा का वर्णन मिलता है। इसकी
तुलना गीता में दिए गए तद्विषयक सिद्धांत से कीजिए। हम देखते हैं कि दोनों इंद्रियों आदि के साथ
आत्मा के तादात्म्य को अस्वीकृत करते हैं। गीता आत्मा को इनसे भिन्न स्वीकार करती है। बौद्ध धर्म
इसे भी अस्वीकृत करता है और इंद्रियों के अतिरिक्त किसी सत्ता को नहीं मानता।
- इस विषय पर कश्मीर के मुख्य न्यायाधीश श्री एस.डी. बुद्धिराजा, एम.ए., एल.एल.बी. की भगवत्गीता
की तुलना कीजिए। लेखक ने गीता और बौद्ध धर्म में पाठ्यमूलक समानता की ओर ध्यान आकृष्ट करने
की बार-बार कोशिश की है।
- मैक्स मूलर, महापरिनिब्बान सुत्त, पृ. 63