9. कृष्ण और उनकी गीता - Page 269

254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संपूर्ण विचारधारा बौद्धों की है और यह बौद्ध धर्म से ली गई है। यदि इस संबंध में किसी को संदेह है तो उसे भगवत्गीता के ब्रह्म-निर्वाण की तुलना बौद्ध धर्म की निर्वाण संबंधी अवधारणा से करनी चाहिए, जिसका विवेचन महापरिनिब्बान सुत्त में किया गया है। हम देखेंगे कि ये दोनों एक हैं जिसे गीता में ब्रह्म-निर्वाण के लिए निर्धारित किया है। क्या यह सत्य नहीं है कि भगवत्गीता ने निर्वाण की अपेक्षा ब्रह्म-निर्वाण की संपूर्ण अवधारणा कहीं से ग्रहण की है और ऐसा यह विचार बौद्ध धर्म से लिए गए इस तथ्य को छिपाने के लिए किया गया है?

एक अन्य उदाहरण लीजिए। अध्याय 7 के श्लोक 13-20 में इस बात का विवेचन किया गया है कि कृष्ण को कौन प्रिय है, वह व्यक्ति जो ज्ञानी है, वह व्यक्ति जो कर्म करता है अथवा वह व्यक्ति जो भक्त है। कृष्ण कहते हैं कि उनको भक्त प्रिय है, परंतु वह यह भी कहते हैं कि उसमें भक्ति के शुद्ध गुण होने चाहिएं। सच्चे भक्त के क्या गुण होते हैं? कृष्ण के अनुसार, सच्चा भक्त वही है जो - (1) मैत्री (निश्छल सहानुभूति), (2) करुणा (दया), (3) मुदित (सहानुभूतिपूर्ण आनंद), और (4) उपेक्षा (अंतबंधता) का आचरण करता है। भगवत्गीता में सच्चे भक्त के ये लक्षण कहां से लिए गए हैं? यहां भी इसका स्रोत बौद्ध धर्म ही है। यदि कोई व्यक्ति प्रमाण चाहता है तो वह महापदान सुत्त ख्1, और तेविज्जा सुत्त ख्2, से इसकी तुलना करें, जहां बुद्ध उन ‘भावनाओं’ (मानसिक प्रवृत्तियों) का उपदेश देते हैं, जो हृदय को संयमित करने के इच्छुक व्यक्ति के लिए आवश्यक हैं। इस तुलना से यह सिद्ध हो जाएगा कि यह संपूर्ण विचारधारा बौद्ध धर्म से ली गई है और यह शब्दशः अंगीकार की गई है।

तीसरा उदाहरण लीजिए। अध्याय 13 में भगवत्गीता में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विषय का विवेचन किया गया है। भगवत्गीता के श्लोक 7-11 में कृष्ण ने यह बताया है कि ज्ञान क्या है और अज्ञान क्या है, जो इस प्रकार है-

फ्दंभरहितता (दीनता), निरहंकार, अहिंसा अथवा अहानिकारक, क्षमा, आर्जव (स्पष्टता), गुरु भक्ति, शुचिता, दृढ़ता, आत्म-संयम, इंद्रिय संबंध विषयों में अनिच्छा, अहं का प्रभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि से संबंधित दुःख और पाप पर विचार, ममत्व का अभाव, पुत्र, पत्नी, घर, शरीर तथा अन्य से अनासक्ति, प्रिय और अप्रिय दोनों स्थितियों में समभाव, मुझमें एकाग्र चिंतन सहित अनन्य भक्ति, पृथक स्थान का सेवन (एकांत में मनन, ध्यान), सांसारिक मनुष्यों की समाज के प्रति विरक्ति, आत्म से संबंधित ज्ञान का निरंतर मनन, तत्व (सांख्य दर्शन) के सही आशय का बोध या अनुभव, यह सब ज्ञान कहलाता है, इससे विपरीत जो कुछ भी है, वह अज्ञान है।य्

  1. देखिए, महापदान सुत्त

  2. देखिए, तेविज्जा सुत्त