प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
255
जिस किसी को बुद्ध के सिद्धांतों की थोड़ी बहुत भी जानकारी है, क्या वह यह इंकार कर सकता है कि भगवत्गीता के इन श्लोकों में बौद्ध धर्म के सिद्धांतों की शब्दशः पुनरोक्ति नहीं की गई है?
भगवत्गीता में अध्याय 13 के श्लोक 5, 6, 18, 19 में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत कर्म की नवीन प्रतीकात्मक व्याख्या की गई है, जैसे (1) यज्ञ (बलि), (2) दान (उपहार), (3) तप (प्रायश्चित), (4) भोजन, और (5) स्वाध्याय (वैदिक अध्ययन)। प्राचीन विचारों की इस नवीन व्याख्या का स्रोत क्या है? इसकी तुलना उससे की जाए जो मज्झिम निकाय 286, 16 में बुद्ध के द्वारा कहा गया है। क्या कोई इसमें संदेह कर सकता है कि कृष्ण ने अध्याय 17 के श्लोक 5, 6, 18, 19 में बुद्ध के शब्दों को ज्यों का त्यों प्रस्तुत नहीं किया है?
मैंने सैद्धांतिक दृष्टि से जो महत्वपूर्ण उद्धरण चुने हैं, ये उनके कुछेक उदाहरण हैं। जो लोग इस विषय के अध्ययन करने में रुचि रखते हैं, वे गीता और बौद्ध धर्म के बीच समानताओं के उन संदर्भों को देख सकते हैं, जो श्री तेलंग ने भगवत्गीता के अपने संस्करण की पाद-टिप्पणियों में दिए हैं तथा अपनी जिज्ञासा का समाधान कर सकते हैं। परंतु मैंने जो उदाहरण दिए हैं, वह यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि भगवत्गीता में बौद्ध धर्म की विचारधारा का कितना अधिक समावेश है और भगवत्गीता ने बौद्ध धर्म से कितना अधिक ग्रहण किया है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि भगवत्गीता की रचना सोद्देश्य रूप में बौद्ध धर्म के सुत्तों (सूत्रों) के आधार पर की गई है। इसमें जो कथोपकथन हैं, वह बुद्ध के सुत्त (सूत्र) हैं। बौद्ध धर्म ने महिलाओं और शूद्रों के उद्धार का आश्वासन दिया था। इसी प्रकार कृष्ण ने भी महिलाओं और शूद्रों को उद्धार का आश्वासन दिया है। बौद्ध धर्मावलंबियों का कहना हैः ‘मैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूं।’ ठीक इसी प्रकार कृष्ण कहते हैंः ‘सभी धर्मों को त्याग दो और स्वयं को मुझे समर्पित कर दो।’ जितनी समानता बौद्ध धर्म और भगवत्गीता में मिलती है, उतनी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।
मैंने यह बताया कि गीता पूर्व-मीमांसा के बाद की और बौद्ध धर्म के भी बाद की रचना है। मैं अपनी स्थापना को समाप्त कर सकता था। परंतु मैं अनुभव करता हूं कि यह संभव नहीं है, क्योंकि मेरी स्थापना के विरुद्ध एक तर्क शेष है, जिसका उत्तर दिया जाना आवश्यक है। यह भी तिलक का तर्क है। यह एक बुद्धिकौशल है। श्री तिलक यह अनुभव करते हैं कि भगवत्गीता और बौद्ध धर्म, दोनों में विचारों और उनकी अभिव्यक्ति में अनेक समानताएं हैं। चूंकि बौद्ध धर्म भगवत्गीता से प्राचीन है, अतः यह स्वाभाविक है कि भगवत्गीता की स्थिति ऋणी की है और बौद्ध धर्म की ऋणदाता की है। यह सीधी सी बात श्री तिलक को रुचिकर नहीं है और उन सभी लोगों को भी नहीं सुहाती जो प्रतिक्रांति को उचित मानते हैं। उन सभी के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है कि प्रतिक्रांति को क्रांति का ऋणी नहीं होना चाहिए। इस कठिनाई को दूर करने के लिए