256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री तिलक ने एक नई बात खोज निकाली। उन्होंने हीनयान बौद्ध धर्म और महायान बौद्ध धर्म के बीच अंतर बताया है तथा यह कहा कि महायान बौद्ध धर्म भगवत्गीता के बाद अस्तित्व में आया और यदि बौद्ध धर्म तथा भगवत्गीता के बीच कोई समानताएं हैं तो भगवत्गीता से महायान बौद्ध धर्मावलंबियों के द्वारा विचार ग्रहण किए जाने के कारण हैं। इससे दो प्रश्न उठते हैं। महायान बौद्ध धर्म की उत्पत्ति की क्या तिथि है? भगवत्गीता की रचना की तिथि क्या है? श्री तिलक का तर्क एक बुद्धिकौशल और चतुराई है। परंतु इसमें कोई सार नहीं है। पहले तो यह मौलिक नहीं है। यह विंटरनिट्ज ख्1, और केर्न ख्2, द्वारा सरसरी तौर पर की गई कतिपय टिप्पणियों के आधार पर हैं। ये टिप्पणियां उनकी पाद-टिप्पणियों में मिलती हैं। इनमें कहा गया है कि भगवत्गीता और महायान बौद्ध धर्म में कुछ समानताएं हैं और यह समानताएं भगवत्गीता से ग्रहण किए गए विचारों के आधार पर हैं। इन टिप्पणियों की पुष्टि में विंटरनिट्ज, केर्न अथवा श्री तिलक द्वारा किसी विशेष अनुसंधान का साक्ष्य नहीं दिया गया है। यह सभी टिप्पणियां इन अनुमानों के आधार पर हैं कि भगवत्गीता महायान बौद्ध धर्म से पूर्व की रचना है।
इसके बाद मेरे सामने प्रश्न भगवत्गीता के रचना-काल का है और भगवत्गीता की तिथि के प्रश्न पर विचार करना है, और इस प्रश्न पर विशेषकर उस मत के संदर्भ में विचार किया जाना है, जो श्री तिलक ने प्रस्तुत किया है। श्री तिलक ख्3, का मत है कि गीता, महाभारत का एक भाग है और इन दोनों का रचयिता व्यास नामक एक ही लेखक है, जिसने इन दोनों की रचना की थी। इसलिए गीता का रचना-काल वही होना चाहिए, जो महाभारत का रचना-काल है। श्री तिलक का यह तर्क है कि महाभारत शक संवत् से कम से कम 500 वर्ष पूर्व रचा गया, जिसका आधार यह है कि महाभारत की कथाएं मेगस्थनीज को पता थीं, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में ग्रीक राजदूत के रूप में लगभग 300 वर्ष ईसा पूर्व में भारत आए थे। शक संवत् 78 ईसवी में प्रारंभ हुआ। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि भगवत्गीता की रचना 422 ईसा पूर्व की गई थी। वर्तमान गीता के रचना-काल के बारे में यही उनका मत है। उनके मतानुसार मूल गीता, महाभारत की अपेक्षा कुछ शताब्दियों पुरानी होनी चाहिए। यदि भगवत्गीता में दी गई परंपरा पर विश्वास किया जाए कि भगवत्गीता में धर्म की शिक्षा प्राचीन-काल में नर द्वारा नारायण को दी गई थी, तो ऐसी स्थिति में महाभारत की रचना की तिथि के बारे में श्री तिलक का मत तर्कसंगत नहीं है। पहली बात तो यह है कि यहां यह अनुमान किया गया है कि संपूर्ण भगवत्गीता और संपूर्ण महाभारत की रचना एक ही बार, एक ही समय और एक ही व्यक्ति द्वारा की गई। परंपरा और इन दोनों ग्रंथों में प्राप्त अंतः साक्ष्य की दृष्टि से इस अनुमान
हिस्ट्री ऑफ इंडियन लिटरेचर (अंग्रेजी अनुवाद), खंड 2, पृ. 229, पाद टिप्पणी
मैनुअल ऑफ इंडियन बुद्धिज्म, पृ. 122, पाद-टिप्पणी।
गीता रहस्य, खंड 2, पृ. 791-800