प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
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का कोई औचित्य नहीं है। अगर हम महाभारत तक अपने विचार-विमर्श को सीमित रखें, तो पता चलेगा कि श्री तिलक द्वारा किया गया अनुमान सुपरिचित भारतीय परंपराओं के नितांत विरुद्ध है। यह परंपरा महाभारत की रचना को तीन चरणों में विभाजित करती है - (1) जय, (2) भारत, और (3) महाभारत - और प्रत्येक भाग को अलग-अलग लेखक की कृति बताती है। इस परंपरा के अनुसार व्यास महाभारत के प्रथम संस्करण के लेखक थे, जिसे ‘जय’ कहा जाता है। द्वितीय संस्करण का नाम भारत है। परंपरा इसे वैशम्पायन का लिखा बताती है। यह परंपरा एक पुष्ट परंपरा थी। इसकी पुष्टि प्रोफेसर होपकिन्स के अनुसंधानों द्वारा होती है, जो महाभारत के अंतःसाक्ष्य के परीक्षण पर आधारित है। प्रोफेसर होपकिन्स ख्1, के अनुसार महाभारत की रचना कई चरणों में हुई। प्रोफेसर होपकिन्स ख्2, का कहना है कि प्रथम चरण में यह केवल पांडु महाकाव्य था। इसमें उपदेशात्मक सामग्री नहीं थी और उसमें उन वीरों से संबंधित कथा और आख्यान थे, जिन्होंने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था। प्रोफेसर होपकिन्स का कहना है कि यह रचना 400-200 ईसा पूर्व में हुई होगी। दूसरे चरण में इस महाकाव्य की पुनर्रचना हुई और इसमें उपदेश आदि और पुराणों से सामग्री का समावेश किया गया। यह 200 ईसा पूर्व और 200 ईसवी के मध्य हुआ। (1) तीसरे चरण में पहले चरण की कृति को साथ में मिलाकर दूसरे चरण की कृति में बाद के पुराणों को शामिल किया गया, और (2) संवर्द्धित अनुशासन पर्व को शांति पर्व से अलग किया गया है तथा एक अलग पर्व बना दिया गया। यह 200 से 400 ईसवी के बीच हुआ। प्रोफेसर होपकिन्स इन तीनों चरणों के अतिरिक्त एक और चरण, अर्थात् यदा-कदा हुए विस्तार की अंतिमावस्था बताते हैं। यह 400 ईसवी के बाद में हुआ। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले प्रो. होपकिन्स ने उन सभी तर्कों का अनुमान और उन पर विवेचन कर लिया था, जो श्री तिलक ने दिए हैं, जैसे पाणिनि ख्3, की कृति और गृह्य सूत्रों ख्4, में महाभारत का उल्लेख। श्री तिलक ने जो नए साक्ष्य दिए हैं और जिन पर प्रो. होपकिन्स ने विचार ही नहीं किया था, वे दो हैं। इस तरह का पहला साक्ष्य वह है, जिसमें कुछ विवरण दिए गए हैं। इनके बारे में यह बताया जाता है कि ये मेगस्थनीज ख्5, के हैं, जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में ग्रीक राजदूत बनकर आया था। दूसरे साक्ष्य खगोलीय हैं ख्6, जो आदि पर्व में मिलते हैं। इनमें उत्तरायण का उल्लेख है जो श्रवण नक्षत्र से प्रारंभ होता है। श्री तिलक ने जो तथ्य मेगस्थनीज के विवरण के आधार पर दिए हैं, उन्हें अस्वीकार नहीं किया जा सकता
दि ग्रेट इपिक ऑफ इंडिया, पृ. 398
वही, पृ. 398
वही, पृ. 395
वही, पृ. 390
गीता रहस्य, पृ. 79
वही, पृ. 789