258 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और उनसे यह सिद्ध हो सकता है कि मेगस्थनीज के समय में, अर्थात् 300 ईसा पूर्व शौरसैनी समाज में कृष्ण भक्ति संप्रदाय था, परंतु इससे यह कैसे सिद्ध हो सकता है कि महाभारत की रचना हो चुकी थी। यह नहीं हो सकता। इससे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि मेगस्थनीज ने जिन आख्यानों-कथाओं का उल्लेख किया है, वे महाभारत से ली गई हैं। इससे यह तो सिद्ध नहीं होता कि ये आख्यान और कथाएं और कहानियां जनसमूह में व्याप्त नहीं थीं और महाभारत के लेखक तथा ग्रीक राजदूत, दोनों ने ही इस अपार सामग्री का चयन नहीं किया था।
श्री तिलक का खगोलीय साक्ष्य काफी ठोस हो सकता है। उनका यह कथन सच है ख्1, कि अनुगीता में यह कहा गया है कि विश्वामित्र ने श्रवण (मा.भा.अश्व. 44.2. और आदि .71.34) से नक्षत्र की गणना प्रारंभ की थी। समीक्षकों द्वारा इस तथ्य की व्याख्या की गई है और उन्होंने यह बताया कि उस समय उत्तरायण का प्रारंभ श्रवण नक्षत्र से हुआ था और इसमें मतभेद करना उचित नहीं है। वेदांग ज्योतिष के अनुसार उत्तरायण धनिष्ठा नक्षत्र में सूर्य के आने पर प्रारंभ होता है। खगोलीय गणना के अनुसार धनिष्ठा नक्षत्र में सूर्य के आने पर उत्तरायण के आरंभ होने का समय शक संवत् शुरू होने के लगभग 1500 वर्ष पूर्व का होना चाहिए। लेकिन खगोलीय गणना के अनुसार उत्तरायण का एक नक्षत्र पूर्व प्रारंभ होने के लिए एक हजार वर्ष का समय लगाता है। इस गणना के अनुसार उत्तरायण श्रवण नक्षत्र में सूर्य के आने पर प्रारंभ होना चाहिए। यह शक संवत् से पूर्व लगभग 500 वर्ष का समय होता है। यह निष्कर्ष तब उचित था, यदि यह सत्य होता कि संपूर्ण महाभारत एक ग्रंथ के रूप में एक ही समय और एक ही व्यक्ति द्वारा रचा गया था। यह भी बताया गया है कि इस अनुमान के लिए कोई प्रमाण नहीं है। अतः श्री तिलक के खगोलीय साक्ष्य के आधार पर महाभारत की रचना-तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती। यह साक्ष्य महाभारत के उस भाग की भी रचना-तिथि के निर्धारण में प्रयोग किया जा सकता है, जो इसके द्वारा प्रभावित है। इस प्रसंग में महाभारत का आदि पर्व उल्लेखनीय है। इन्हीं कारणों से महाभारत की रचना की तिथि के संबंध में श्री तिलक का सिद्धांत सटीक नहीं बैठता। वास्तव में महाभारत जैसी कृति के लिए कोई भी एक तिथि के निर्धारण करने का प्रयत्न व्यर्थ ही समझा जाना चाहिए, जो धारावाहिक कथा के रूप में अंतराल देकर दीर्घ-काल तक लिखा जाता रहा था। हम यही कह सकते हैं कि महाभारत की रचना 400 ईसा पूर्व से लेकर 400 ईसवी तक की गई। इस निष्कर्ष से वह प्रयोजन पूरा नहीं होता, जो श्री तिलक का अभीष्ट है। कुछ विद्वानों को यह अवधि भी बहुत कम लगती है। कहा जाता है ख्2, कि वन पर्व के 190वें अध्याय में उल्लिखित एडूकों की व्याख्या गलत की गई है और उसका अर्थ
गीता रहस्य, 2, पृ. 789
धर्मानंद कोसांबी, हिंदी संस्कृति आणि अहिंसा (मराठी), पृ. 156