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प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता

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बौद्ध स्तूप लगाया गया, जबकि इसका आशय ईदगाहों से है, जिनका निर्माण मुसलमान आक्रमणकारियों ने मुस्लिम धर्म में परिवर्तित किए गए लोगों के लिए किया था। यदि यह व्याख्या सही है तो इससे यह सिद्ध होगा कि महाभारत के कुछ भाग मोहम्मद गौरी के आक्रमणों के समय अथवा उसके बाद लिखे गए थे।

अब मैं भगवत्गीता की रचना-तिथि के बारे में श्री तिलक की स्थापनाओं को लेता हूं। वास्तव में उनकी स्थापना में दो तर्क अंतर्निहित हैं। प्रथम, गीता महाभारत का एक भाग है। इन दोनों का रचना-काल एक ही है और वे दोनों ग्रंथ एक ही व्यक्ति के द्वारा रचे गए हैं। उनका दूसरा तर्क यह है कि जो भगवत्गीता आज उपलब्ध है, वह वैसी ही मिलती है, जैसी कि शुरू में लिखी गई थी। मैं इन दोनों तर्कों को अलग-अलग लेता हूं जिससे कोई भ्रांति न हो।

गीता को महाभारत के साथ उसकी रचना के संबंध में सहयोजित करने में श्री तिलक का उद्देश्य नितांत स्पष्ट है। वह महाभारत के रचना-काल के आधार पर, जो उनके अनुसार ज्ञात है, गीता का रचना-काल निर्धारित करना चाहते हैं जो अज्ञात है।

खेद है कि श्री तिलक ने जिस आधार पर महाभारत और भगवत्गीता के बीच निकट संबंध स्थापित करने का प्रयास किया है, वह उनके सिद्धांत का सबसे दुर्बल पक्ष है। अगर हम यह स्वीकार करें कि गीता महाभारत का भाग इसलिए है कि इन दोनों ही ग्रंथों के रचयिता व्यास हैं और यही श्री तिलक का तर्क है तो यह कल्पना को सच समझने जैसी बात होगी। इस तर्क में यह स्वीकार कर लिया जाता है कि व्यास किसी व्यक्ति विशेष का नाम है जो काफी प्रसिद्ध रहा है। यह उस तथ्य से स्पष्ट है कि हमारे सम्मुख व्यास महाभारत के रचयिता हैं, व्यास पुराणों के रचयिता हैं, व्यास भगवत्गीता के रचयिता हैं और यही व्यास ब्रह्म सूत्रों के भी रचयिता हैं। इसलिए यह बात सच नहीं मानी जा सकती कि वही व्यास इन सभी ग्रंथों के रचयिता हैं, जो शताब्दियों तक अलग-अलग लिखे गए। हम सभी जानते हैं कि धार्मिक लेखक अपना नाम छिपाकर उसके बदले किसी पूज्य नाम का उपयोग करके किस प्रकार अपनी कृति को प्रतिष्ठित करा देते हैं और उन दिनों छद्मनाम या उपनाम के रूप में व्यास नाम का उपयोग करना उनका स्वभाव बन गया था। यदि गीता के रचयिता व्यास हैं तो कोई दूसरा ही व्यक्ति होना चाहिए, जिसने व्यास नाम का उपयोग किया है।

एक अन्य तर्क भी है जो भगवत्गीता और महाभारत की एक ही काल में रचना किए जाने के श्री तिलक के सिद्धांत का विरोध करता है। महाभारत में 18 पर्व हैं। इसके अलावा 18 पुराण भी हैं। यह आश्चर्यजनक बात है कि भगवत्गीता में भी 18 अध्याय हैं। प्रश्न यह है कि यह एक जैसा क्यों है? इसका उत्तर यह है कि प्राचीन भारतीय लेखक कुछ नामों और कुछ संख्याओं के बारे में यह समझते थे कि ये अधिक पवित्र हैं। इस तथ्य का उदाहरण व्यास का नाम और 18 की संख्या है, परंतु भगवत्गीता के