260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अध्यायों को 18 तक निर्धारित करने में जो कुछ ऊपरी तौर से दिखता है, उसकी अपेक्षा कोई और विशेष बात है। किसने 18 को पवित्र संख्या निर्धारित किया। क्या महाभारत ने या गीता ने 18 तक निर्धारित करने में जो कुछ ऊपरी तौर से दिखता है, उसकी अपेक्षा कोई और विशेष बात है। किसने 18 को पवित्र संख्या निर्धारित किया। क्या महाभारत ने या गीता ने? यदि महाभारत ने इसे पवित्र संख्या निर्धारित किया, तब गीता महाभारत के बाद ही रची गई। यदि भगवत्गीता ने इसे पवित्र संख्या निर्धारित किया, तो महाभारत की रचना गीता के बाद होनी चाहिए। स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न हो, इन दोनों ग्रंथों की रचना एक ही समय में नहीं की गई होगी।
इस विवेचन को हो सकता है, श्री तिलक के पहले प्रस्ताव की दृष्टि से निर्णायक स्वीकार न किया जाए, परंतु एक तर्क है जिसे मैं निर्णायक समझता हूं। मेरा संकेत महाभारत और भगवत्गीता में कृष्ण की तुलनात्मक स्थिति की ओर है। महाभारत में कृष्ण को कहीं भी भगवान नहीं बताया गया है, जो सभी लोगों को मान्य थे। स्वयं महाभारत में ही यह दिखाया गया है कि जन-समुदाय कृष्ण को प्रथम स्थान देने के लिए भी तैयार नहीं था। राजसूय यज्ञ में जब धर्मराज ने अतिथियों के सत्कार के समय कृष्ण को प्राथमिकता देनी चाही, तब शिशुपाल ने, जो कृष्ण का निकट संबंधी था, कृष्ण का विरोध किया और उन्हें अपशब्द भी कहे। उन्होंने उन्हें निम्न वंश में पैदा हुआ ही नहीं कहा, परंतु उन्हें चरित्रहीन और ऐसा षड्यंत्रकारी कहा जिसने विजय के लिए युद्ध के नियमों का भी उल्लंघन किया। स्वयं महाभारत के गदा पर्व में इसका उल्लेख है कि कृष्ण के ये कुकृत्य इतने घृणित लेकिन सत्यतापूर्ण हैं कि जब दुर्योधन कृष्ण के सामने इनका बखान करता है तब दोषारोपण सुनने के लिए स्वर्ग से देवता आ गए जो दुर्योधन ने कृष्ण के विरुद्ध लगाए थे और उन अभियोगों के सुनने के बाद उन्होंने अपनी सहमति के प्रतीक स्वरूप पुष्पों की वर्षा की कि ये अभियोग पूर्ण सत्य हैं और सत्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हैं। दूसरी ओर भगवत्गीता में कृष्ण को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, पवित्र, प्रिय और सद्गुण के सार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ये दोनों रचनाएं, जिनमें एक ही व्यक्ति का परस्पर विरोधी आकलन का इस प्रकार से उल्लेख है, एक ही लेखक द्वारा एक ही काल में नहीं लिखी जा सकतीं। खेद की बात है कि श्री तिलक भगवत्गीता को बौद्ध-काल के पूर्व की रचना सिद्ध करते समय इस महत्वपूर्ण तथ्य को बिल्कुल ही भूल गए।
श्री तिलक का दूसरा तर्क भी निर्मूल है। भगवत्गीता के रचना-काल को निर्धारित करने का कार्य मृगमरीचिका के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इस तर्क की विफलता निश्चित है। इसका कारण यह है कि गीता अकेली पुस्तक नहीं, जिसे एक ही लेखक ने लिखा होगा। इस ग्रंथ में अलग-अलग अध्याय हैं जिन्हें अलग-अलग लेखकों ने अलग-अलग समय पर रचा है।