प्रतिक्रांति की दार्शनिक पुष्टिः कृष्ण और उनकी गीता
261
प्रोफेसर गार्बे एकमात्र ऐसे विद्वान हैं, जिन्होंने इस प्रकार परीक्षण किया जाना आवश्यक समझा है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भगवत्गीता में अलग-अलग चार भाग हैं। वे एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं कि आज जिस स्थिति में यह ग्रंथ विद्यमान है, उसमें इन्हें सरलता से निर्दिष्ट किया जा सकता है।
( i ) मूल गीता चरणों द्वारा वर्णित या गाई गई वीर-गाथा मात्र है कि अर्जुन किस प्रकार युद्ध करने के लिए तैयार नहीं था तथा कृष्ण ने उन्हें युद्ध करने के लिए किस प्रकार प्रेरित किया और अर्जुन ने यह बात मान ली, आदि-आदि। यह कौतूहल भरी कहानी रही होगी, परंतु इसमें कुछ भी धार्मिक अथवा दार्शनिक नहीं था।
मूल गीता अध्याय 1, अध्याय 2 और अध्याय 11 के श्लोक 32-33 में मिलती है जिसमें कृष्ण ने अपने तर्क का समापन इस प्रकार किया हैः
फ्मेरे साधन बनो, मेरी इच्छा का पालन करो। युद्ध-जन्य पाप और अनिष्ट की चिंता मत करो, वही करो जैसा कि मैं कहूं। धृष्ट मत बनो।य्
यही वह तर्क है जिसका कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के लिए बाध्य करने के लिए प्रयोग किया था और प्रेरणा और आग्रह भरे इसी तर्क ने अर्जुन को राजी कर लिया था। कृष्ण ने संभवतः यह धमकी दी होगी कि अगर उसने युद्ध नहीं किया तो वह बल प्रयोग करेंगे। कृष्ण द्वारा अपने विश्व रूप का अहंकार जताना इस बल प्रदर्शन का केवल एक रूप है। इसी सिद्धांत के आधार पर वर्तमान गीता में विश्व रूप से संबंधित अध्याय का मूल भगवत्गीता का एक भाग होना संभव हो सकता है।
( ii ) मूल भगवत्गीता में प्रथम क्षेपक उसी अंश का एक भाग है जिसमें कृष्ण को ईश्वर कहा गया है और उन्हें भागवत धर्म में परमेश्वर कहा गया है। गीता का यह भाग वर्तमान भगवत्गीता के उन श्लोकों में मिलता है जहां भक्ति योग का विवेचन है।
( iii ) मूल भगवत्गीता में दूसरा क्षेपक वह भाग है जहां उस पूर्व-मीमांसा के सिद्धांतों की पुष्टि के रूप में सांख्य और वेदांत दर्शन का वर्णन है जो उनमें पहले नहीं था। गीता प्रारंभ में एक ऐतिहासिक आख्यान था जिसमें कृष्ण भक्ति बाद में समाविष्ट कर दी गई। भगवत्गीता में दर्शन संबंधी अंश बाद में जोड़ा गया, यह मूल संवाद की शैली और उसके क्रम से सरलतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है।
अध्याय 1, श्लोक 20-47 में अर्जुन उन कठिनाइयों का वर्णन करते हैं। अध्याय 2 में कृष्ण अर्जुन द्वारा बताई गई कठिनाइयों को पूरा करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार तर्क-वितर्क का क्रम चलता है। कृष्ण का प्रथम तर्क श्लोक दो और तीन में दिया गया है जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि उसका यह आचरण अकीर्तिकर है और आर्य के लिए अशोभनीय है, वह अपुरुषोचित कार्य न करे, यह उसकी जो उनके मर्यादा के प्रतिकूल है। इस तर्क का अर्जुन ने जो उत्तर दिया है, वह श्लोक 4 से 8 तक वर्णित है।