262 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्लोक 4 और 5 में अर्जुन कहता है कि ‘मैं भीष्म और द्रोण की हत्या कैसे कर सकता हूं जो सर्वोच्च आदर के पात्र हैं। इनकी हत्या करने की अपेक्षा भिक्षार्जन करके जीवन यापन करना श्रेयस्कर है। मैं इन वृद्ध और पूज्य जनों का वध कर राज्य-सुख भोगने के लिए जीवनयापन नहीं करना चाहता।’ श्लोक 6 से 8 तक अर्जुन कहता हैः ‘इन दो में क्या श्रेयस्कर है, यह मैं नहीं जानता। क्या हमें कौरवों का समूल नाश करना श्रेयस्कर है अथवा उनके द्वारा हमें पराजित होना श्रेयस्कर है।’ अर्जुन के इस प्रश्न का जो उत्तर कृष्ण ने दिया, वह 11 से 39 तक के श्लोकों में मिलता है। इस उत्तर में कृष्ण यह प्रतिपादित करते हैं (1) कि शोक करना अनुचित है क्योंकि सारी वस्तुएं नाशवान होती हैं, (2) यह धारणा असत्य है कि व्यक्ति मर जाता है क्योंकि आत्मा शाश्वत है, और (3) उसे युद्ध करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय का कर्तव्य युद्ध करना होता है।’
जो भी व्यक्ति इस संवाद को पढ़ता है, उसके मन में निम्नलिखित विचार आते हैंः
(1) अर्जुन ने जो प्रश्न प्रस्तुत किए, वे दार्शनिक प्रश्न नहीं हैं। वे स्वाभाविक प्रश्न हैं जो ऐसे लौकिक व्यक्ति द्वारा किए गए हैं जो सांसारिक समस्याओं से जूझ रहा है।
(2) कुछ सीमा तक कृष्ण इन प्रश्नों को स्वाभाविक प्रश्न मानते हैं और इनका नितांत स्वाभाविक उत्तर भी देते हैं।
(3) यह संवाद एक नया मोड़ ले लेता है। अर्जुन ने जब कृष्ण को यह सूचित कर दिया कि वह निश्चय ही युद्ध नहीं करेगा तब वह एक नया प्रश्न करता है और यह संदेह व्यक्त करता है कि कौरवों को मारना श्रेयस्कर है अथवा उनके हाथों मारा जाना श्रेयस्कर है।
यह परिवर्तन सोद्देश्य किया गया जिससे कृष्ण युद्ध की दार्शनिक दृष्टि से पुष्टि कर सके जो अर्जुन के कथन के संदर्भ में अनावश्यक था।
(4) इसके बाद श्लोक 31 से 38 तक कृष्ण की वाणी मृदु हो जाती है। वह प्रश्न को स्वाभाविक बताते हैं और अर्जुन से युद्ध करने के लिए कहते हैं क्योंकि क्षत्रिय का कर्तव्य युद्ध करना है।
कोई भी पाठक इससे यह समझ सकता है कि वेदांत-दर्शन का विवेचन नितांत अप्रासंगिक है और बाद में जोड़ा गया है। जहां तक सांख्य-दर्शन का संबंध है, स्थिति बड़ी ही स्पष्ट है। अर्जुन के प्रश्न न करने पर भी इसका अक्सर विवेचन किया गया है। जब कभी इसका किसी प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रतिपादन किया गया है, तब उस प्रश्न का युद्ध से कोई संबंध नहीं है। इससे यह पता चलता है कि भगवत्गीता का दार्शनिक अंश मूल गीता के अंश नहीं हैं परंतु इन्हें बाद में जोड़ा गया है और उनके लिए स्थान देने के लिए अर्जुन से कुछ नवीन, समुचित और प्रमुख प्रश्न करवाए गए हैं जिनका युद्ध की लौकिक समस्याओं से कोई संबंध नहीं है।