विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां
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ने भी सुशर्मा का समर्थन किया। पांडवों के बारे में चिंता क्यों की जाए? ये पांडव धन और सेना से वंचित हैं तथा परास्त हैं। उनके बारे में परेशान क्यों हुआ जाए? वे अब तक मौत की गोद में चले गए होंगे। इस खोज-अभियान का त्याग कर दिया जाए और सुशर्मा की योजना को अमल में लाया जाए।-(वही, अध्याय-30)
सुशर्मा विराट पर आक्रमण करता है। सुशर्मा विराट की गायों को ले आता है। गायों के चरवाहे विराट को यह सूचना देते हैं और सम्राट से आग्रह करते हैं कि सुशर्मा का पीछा किया जाए तथा गायों की रक्षा की जाए।-(वही, अध्याय-31)
विराट युद्ध के लिए तैयार हो गया। इस बीच विराट के छोटे भाई शतनीक ने सुझाव दिया कि अकेले जाने के बजाय वह अपने साथ कनक (सहदेव), बल्लभ (युधिष्ठिर), शांतिपाल (भीम) और ग्रांथिक (नकुल) को अपने साथ ले लें, ताकि वे सुशर्मा से युद्ध करने में उनकी सहायता करें। विराट ने इस सुझाव पर अपनी सहमति प्रकट की और वे सभी गए।-(वही, अध्याय-31)
सुशर्मा और विराट के बीच युद्ध।-(वही, अध्याय-32)
युधिष्ठिर विराट की रक्षा करता है।-(वही, अध्याय-33)
विराट नगरी में घोषणा होती है कि उनके सम्राट सुरक्षित हैं।-(वही, अध्याय-34)
विराट नगरी में कौरवों का प्रवेश
जब सम्राट विराट सुशर्मा का पीछा कर रहे थे, तभी दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप, अश्वत्थामा, शकुनि, दुःशासन, विविनशति, विकर्ण, चित्रसेन, दुर्मुख, दुशल और अन्य योद्धाओं के साथ विराट नगरी में घुस गए तथा विराट की गायों को पकड़ कर ले जाने लगे। चरवाहे सम्राट विराट के महल में आए और उन्हें यह समाचार दिया। उन्हें सम्राट को खोजने की आवश्यकता नहीं हुई, उन्हें सम्राट का पुत्र उत्तर मिल गया। इसलिए उन्होंने उसे ही यह समाचार दिया।-(वही, अध्याय-35)
उत्तर ने गर्व से कहा कि वह अर्जुन से श्रेष्ठ है और वह उनकी रक्षा कर लेगा। परंतु उसकी यह शिकायत थी कि उसका कोई सारथी नहीं है। द्रौपदी ने उसे बताया कि किसी समय ब्रह्मानंद अर्जुन का सारथी था। उससे क्यों न कहा जाए? उसने कहा कि उसके पास साहस नहीं है, अतः उसने द्रौपदी से निवेदन किया कि वह स्वयं जाकर उस सारथी से कहें। आप अपनी छोटी बहन मनोरमा से क्यों नहीं कहते। इसलिए उसने मनोरमा से कहा कि वह ब्रह्मनंद को ले आए।-(वही, अध्याय-36)
मनोरमा ब्रह्मनंद को अपने भाइयों के पास ले जाती है और उत्तर उसे अपना सारथी बनने के लिए प्रेरित करता है। ब्रह्मनंद ने स्वीकृति दे दी और कौरवों के समक्ष उत्तर का रथ संभाल लिया।-(वही, अध्याय-37)