270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अर्जुन के प़ुत्र और विराट की पुत्री का विवाह।-(वही, अध्याय-72)
उसके बाद पांडव विराट नगरी को छोड़ देते है और वे उपप्लव नगरी में रहने लगते हैं।-(वही, अध्याय-72)
इसके बाद अर्जुन अपने पुत्र अभिमन्यु, वासुदेव और यादव को अमृत देश से लाता है।-(वही, अध्याय-72)
युधिष्ठिर के मित्र सम्राट काशिराज और शल्य दो अक्षौहिणी सेनाओं के साथ आते हैं। इसी प्रकार यज्ञसेन द्रुपदराज एक अक्षौहिणी सेना के साथ आता है। द्रौपदी के सभी पुत्र अजिक्य, शिखंडी, धृष्टद्युम्न भी आ गए।-(वही, अध्याय-72) उद्योग पर्व
अभिमन्यु के विवाह के बाद यादव तथा पांडव सम्राट विराट की सभा में एकत्र हुए। कृष्ण उन्हें संबोधित करते हैं कि भविष्य में क्या करना है। हमें वही करना चाहिए जो कौरवों और पांडवों, दोनों के ही हित में हो। धर्म कुछ भी स्वीकार कर सकता है। यहाँ तक कि एक गांव भी धर्म स्वीकार कर सकता है। यदि उसे दुर्योधन का पूरा साम्राज्य भी दिया जाए तो वह उसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी तक पांडवों ने नीति का पालन किया है। पंरन्तु यदि कौरव अनीति का पालन करते हैं, तो पांडवों को कौरवों का नाश करने में कोई हिचक नहीं होगी। किसी को भी इस तथ्य से भयभीत नहीं होना चाहिए कि पांडव अल्पसंख्यक हैं। उनके मित्र हैं जो उनकी सहायता करने आ जाएंगे। हमें कौरवों की इच्छा का पता करना चाहिए। मेरा सुझाव है कि हमें दुर्योधन के पास एक संदेशवाहक भेजना चाहिए और उससे यह कहा जाए कि वह अपने साम्राज्य का एक भाग पांडवों को दे दे।-(वही, अध्याय-1)
बलराम कृष्ण के सुझाव का समर्थन करता है, परंतु आगे कहता है कि यह धर्म की भूल थी, जब कि वह जानता था कि वह शकुनि के हाथों से पराजित हो रहा है। इसलिए कौरवों के साथ युद्ध न करके यह ठीक होगा कि संधि-वार्ता से जो कुछ भी मिले, उसे प्राप्त करना चाहिए।-(वही, अध्याय-2)
सात्यकी उठ खड़े हुए और उन्होंने बलराम की प्रवृत्ति की भर्त्सना की।-(वही, अध्याय-3)
द्रुपद ने सात्यकी का समर्थन किया। द्रुपद इस बात पर सहमत हो गए कि वह अपने पुरोहित को संदेशवाहक के रूप में भेजेंगे।-(वही, अध्याय-4)
कृष्ण ने द्रुपद का समर्थन किया और वह द्वारका चले जाते हैं। द्रुपद और विराट द्वारा आमंत्रित सभी सम्राट आ पहुंचते हैं। इसी प्रकार दुर्योधन द्वारा जिन सम्राटों को आमंत्रित किया गया, वे भी पहुंच गए।-(वही, अध्याय-5)