272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अवसर पर जो भी उचित समझो, वही कहो जिससे दोनों के बीच शत्रुता न बढ़े।-(वही, अध्याय-22)
संजय का पांडवों के पास जाना।-(वही, अध्याय-23)
संजय और युधिष्ठिर के बीच बातचीत।-(वही, अध्याय-24)
संजय युद्ध की निंदा करता है।-(वही, अध्याय-25)
धर्म का कहना है, ‘मैं समझौता करने के लिए तैयार हूँ, यदि कौरव हमारे इंद्रप्रस्थ साम्राजय को हमें वापस कर दें।’-(वही, अध्याय-26)
गुरुजन का वध करना और साम्राज्य को प्राप्त करना अधर्म है। यदि कौरव बिना युद्ध के किसी साम्राज्य को वापस करने से इंकार करते हैं तो यह अच्छा रहेगा कि आप वृष्णि और अंधक के साम्राज्य में भिक्षा मांगकर जीवनयापन करें।-(वही, अध्याय-27)
इस अध्याय में कहा गया है कि क्या संजय उन्हें धर्म के विरुद्ध कार्य करने अथवा धर्म के विरुद्ध किए गए कार्य का दोषी मानता है। संजय कहता है कि ‘मैं स्वधर्म अथवा क्षमा को चाहता हूँ।’-(वही, अध्याय-28)
कृष्ण संजय से कहते हैं कि युद्ध क्यों वैध है और संजय को बताते हैं कि वह धृतराष्ट्र को उनके विचारों से अवगत करा दें।-(वही, अध्याय-29)
संजय कौरवों के पास आता है और दुर्याधन को युद्ध करने के लिए कहता है। दुर्योधन को या तो इंद्रप्रस्थ पांडवों को वापस कर देना चाहिए अथवा युद्ध के लिए तैयार रहना चाहिए।-(वही, अध्याय-30)
संजय दुर्योधन से कहता है कि वह स्वयं जीवित रहे और उन्हें जीवित रहने दे। यदि वह इंद्रप्रस्थ वापस नहीं कर सकता तो उन्हें कम से कम पांच गांव दे देने चाहिए।-(वही, अध्याय-31)
संजय रात्रि में धृतराष्ट्र के पास पहुंचता है और उससे कहता है कि मैं प्रातः धर्म के संदेश को बताऊंगा।-(वही, अध्याय-32)
धृतराष्ट्र बेचैन होता है और उस संदेश के बारे में जानना चाहता है जो संजय लाया है। इसलिए वह संजय को शीघ्र बुलाता है। संजय उनका संदेश देता है और कहता है कि साम्राज्य का उनका भाग उन्हें देकर समझौता कर लिया जाए।-(वही, अध्याय-33)
धृतराष्ट्र विदुर को आंमत्रित करता है और उसका परामर्श मांगता है। उसका परामर्श यह हैं कि पांडवों को उनके साम्राज्य का भाग दे दिया जाए।-(वही, अध्याय-34)