विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां
- अध्याय-35-असंगत।
273
असंगत । विदुर का कहना है कि दोनों पक्षों को मित्र होना चाहिए।-(वही, अध्याय-36)
अध्याय-37-असंगत।
अध्याय-38-असंगत।
धृतराष्ट्र विदुर से कहता है कि मैं दुर्योधन को छोड़ नहीं सकता, यद्यपि वह बुरा है।-(वही, अध्याय-39)
विदुर चातुर्वर्ण्य का वर्णन करता है।-(वही, अध्याय-40)
धृतराष्ट्र विदुर से बह्मा के बारे में पूछता है। वह कहता है कि मैं नहीं बता सकता, क्योंकि मैं शूद्र हूं। इसके बाद सनत सुजाता आता है।-(वही, अध्याय-41)
ब्रह्म विद्या के बारे में धृतराष्ट्र और सनत सुजाता में परस्पर वार्तालाप होता है।-(वही, अध्याय-42)
सनत सुजाता और धृतराष्ट्र के बीच एक ही विषय पर विचार-विमर्श किया जाता है।-(वही, अध्याय-43)
ब्रह्म विद्या पर सनत सुजाता के विचार।-(वही, अध्याय-44)
सनत सुजाता योग का उपदेश देता है।-(वही, अध्याय-45)
सनत सुजाता आत्मा के बारे में बताता है।-(वही, अध्याय-46)
कौरवों संजय द्वारा लाए गए संदेश को सुनने के लिए सभा में आते है।-(वही, अध्याय-47)
संजय संदेश सुनाता है। (संदेश का, विशेषकर वह अंश, जो अर्जुन ने कहा था)।-(वही, अध्याय-48)
भीष्म द्वारा कृष्ण और अर्जुन की प्रशंसा। कर्ण क्रोधित हो उठता है। द्रोण भीष्म का समर्थन करता है और समझौता करने का परामर्श देता है।-(वही, अध्याय-49)
धृतराष्ट्र संजय से मालूम करता है कि पांडवों और उनके कौन-कौन मित्र हैं तथा उनकी कितनी शक्ति है? संजय उलाहना देता है तथा उत्तर देता है।-(वही, अध्याय-50)
धृतराष्ट्र के पराक्रम का विचार करता है और चिंतित होता है।-(वही, अध्याय-51)
धृतराष्ट्र अर्जुन के पराक्रम का विचार करता है और चिंतित होता है।-(वही,