10. विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां - Page 290

विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां

है।-(वही, अध्याय-67)

  1. संजय धृतराष्ट्र को कृष्ण के बारे में बताते हैं।-(वही, अध्याय-68)

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  1. धृतराष्ट्र दुर्योधन से कहता है कि वह कृष्ण के आगे आत्म-समर्पण कर दे। दुर्योधन इंकार करता है। गांधारी दुर्योधन से अपशब्द कहती है।-(वही, अध्याय-69)

  2. कृष्ण के अलग-अलग नाम और उनका मूल।-(वही, अध्याय-70)

  3. धृतराष्ट्र कृष्ण को समर्पित हो जाता है।-(वही, अध्याय-71)

  4. युधिष्ठिर और कृष्ण में संवाद। युधिष्ठिर बताता है कि संजय ने उससे कहा है कि धृतराष्ट्र पर विश्वास न किया जाए। युधिष्ठिर संपत्ति के महत्व पर बल देता है। क्षात्रधर्म के बारे में बताता है तथा उसके पालन की आवश्कता पर बल देता है। कृष्ण स्वयं कौरवों के पास जाने का सुझाव देता है। युधिष्ठिर को वह विचार अच्छा नहीं लगता, परंतु वह यह कहता है कि कृष्ण जो कहते हैं, वही सर्वोत्तम है।-(वही, अध्याय-72)

  5. कृष्ण धर्म को वह रहस्य बताते हैं, जो उनके मन में है। कृष्ण धर्म से कहते हैं कि कौरवों के साथ मधुर वचन कहने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे अन्य कई कारण हैं कि आपको कौरवों के साथ समझौता क्यों नहीं करना चाहिए। इस बात पर बल देना है कि कौरवों ने द्रौपदी को कितना अपमानित किया? इसलिए हे धर्म! उनको मारने में न हिचकिचाओ।-(वही, अध्याय-73)

  6. भीम कृष्ण से कहता है कि कौरवों के साथ सौहार्द्र से बातचीत की जाए।-(वही, अध्याय-74)

  7. कृष्ण भीम का उपहास करते हैं।-(वही, अध्याय-75)

  8. भीम युद्ध करने के लिए अपना मन पक्का कर लेता है।-(वही, अध्याय-76)

  9. कृष्ण भीम को दैव और पौरुष का अंतर समझाते हैं।-(वही, अध्याय-77)

  10. अर्जुन कृष्ण से कहता है कि ‘क्षमा’ अर्थात् युद्ध न करने का विचार किया जाए।-(वही, अध्याय-78)

  11. कृष्ण का अर्जुन से संवाद। मैं शांति के समझौते के लिए प्रयत्न करुंगा। यदि वह समझौता संभव नहीं हो तो युद्ध करने के लिए तैयार रहना। मैं दुर्योधन को धर्म की उस सहमति के बारे में नहीं बताऊंगा कि वह पांच गांव स्वीकार करने के लिए सहमत है।-(वही, अध्याय-79)

  12. नकुल कृष्ण से कहता है, जो सर्वश्रेष्ठ हो, वही किया जाए।-(वही, अध्याय-80)