10. विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां - Page 292

विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां

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  1. कृष्ण विदुर को बताते हैं कि कौरव उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते हैं। मैं केवल यहां इसलिए आया हूं क्योंकि क्षमा, अर्थात् शांति पुण्यकार्य है।-(वही, अध्याय-93)

  2. कृष्ण कौरवों के सभागार में प्रवेश करते हैं।-(वही, अध्याय-94)

  3. कृष्ण सभा को संबोधित करते हैं। उन्होंने कौरवों से कहा कि पांडव शांति और युद्ध, दोनों के लिए ही तैयार हैं। उन्हें उनका आधा साम्राज्य दे दिया जाए।-(वही, अध्याय-95)

  4. जामदग्नि दंभ के विरोध में एक कहानी कहता है।-(वही, अध्याय-96)

  5. मातलि आख्यान। (वही, अध्याय-97-105)

  6. नारद का दुर्योधन को परामर्श।-(वही, अध्याय-106)

  7. गाल्व आख्यान।-(वही, अध्याय-106-123)

  8. धृतराष्ट्र कृष्ण से कहता है कि वह दुर्योधन को परामर्श दे।-(वही, अध्याय-124)

  9. भीष्म का दुर्योधन को परामर्श। द्रोण का समर्थन। विदुर दुर्योधन की भर्त्सना करते हैं। धृतराष्ट्र का परामर्श।-(वही, अध्याय-125)

  10. भीष्म और द्रोण दूसरी बार दुर्योधन को समझाते हैं।-(वही, अध्याय-126)

  11. दुर्योधन यह घोषणा करता है कि पांडवों को कुछ भी नहीं दिया जाएगा।-(वही, अध्याय-127)

  12. कृष्ण दुर्योधन की भर्त्सना करते हैं। दुर्योधन सभा त्याग देता है। दुःशासन का भाषण। कृष्ण भीष्म को चेतावनी देते हैं।-(वही, अध्याय-128)

  13. धृतराष्ट्र विदुर से कहते हैं कि गांधारी को सभागार में लाया जाए। दुर्योधन वापस आता है। गांधारी उससे कहती हैं कि साम्राज्य का आधा भाग पांडवों को दिया जाए।-(वही, अध्याय-129)

  14. दुर्योधन सभा का त्याग करता है। उसका इरादा है कि कृष्ण का वध कर दिया जाए। सात्यकि धृतराष्ट्र को इस गुप्त कुचक्र की सूचना देता है। कृष्ण का भाषण् ा। धृतराष्ट्र दुर्योधन को सभा में फिर बुलाता है, उसे चेतावनी देता है। विदुर द्वारा भर्त्सना।-(वही, अध्याय-130)

  15. भगवान का विश्व रूप दर्शन, धृतराष्ट्र को दिव्य चक्षु प्राप्त होते हैं। कृष्ण सभा छोड़ देते हैं और कुंती के पास जाते हैं।-(वही, अध्याय-131)