278 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
कृष्ण कुंती से कहते हैं कि सभा में क्या-क्या हुआ। कुंती कृष्ण से कहती है कि क्षत्रियों के लिए युद्ध अनिवार्य है। इससे बढ़कर और कोई धर्म नहीं है।-(वही अध्याय-132)
कुंती अपने मत को पुष्ट करने के लिए कृष्ण से विदुला की कहानी कहती है।-(वही, अध्याय-133)
विदुला की कहानी।-(वही, अध्याय-134)
विदुला की कहानी।-(वही, अध्याय-135)
विदुला की कहानी।-(वही, अध्याय-136)
कुंती की अपने पुत्रों को सलाह। कृष्ण का कर्ण को परामर्श और कृष्ण का उपप्लव्य नगरी के लिए प्रस्थान।-(वही, अध्याय-137)
भीष्म और द्रोण द्वारा दुर्योधन को परामर्श।-(वही, अध्याय-138)
भीष्म का दुःख। द्रोण फिर दुर्योधन को परामर्श देता है।-(वही, अध्याय-139)
धृतराष्ट्र और संजय के मध्य वार्तालाप। कर्ण को कृष्ण परामर्श देता है।-(वही, अध्याय-140)
कर्ण का कृष्ण को उत्तर।-(वही, अध्याय-141)
कृष्ण का कर्ण को आश्वासन, पांडवों की विजय होगी।-(वही, अध्याय-142)
कर्ण को अपशकुन होते हैं। पांडवों को समाप्त करने का उसका दृढ़ निश्चय। उसका गृह को प्रस्थान।-(वही, अध्याय-143)
विदुर और पृथु के मध्य वार्तालाप। उसे पता चलता है कि दुर्योधन युद्ध करने के लिए दृढ़ है। कुंती का दुःख। कर्ण को उसके मूल के बारे में बताने की इच्छा। कुंती नदी के किनारे जाती है।-(वही, अध्याय-144)
कुंती कर्ण से भेंट करती है। वह कर्ण को उसके मूल के बारे में बताती है तथा उससे निवेदन करती है कि वह पांडवों के साथ हो जाए।-(वही, अध्याय-145)
सूर्य कुंती से प्रस्ताव का समर्थन करता है। कर्ण उसको अस्वीकार कर देता है अर्जुन को छोड़कर सभी पांडवों को बचाने का वचन देता है।-(वही, अध्याय-146)
कृष्ण पांडवों के पास जाते हैं। युधिष्ठिर पूछता है कि कौरव-सभा में क्या-क्या हुआ।-(वही, अध्याय-147)