विराट पर्व और उद्योग पर्व की विश्लेषणात्मक टिप्पणियां
- कृष्ण पूरी कहानी सुनाता है।-(वही, अध्याय-147, 148, 149, 150)
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पांडवों की सेना के सेनापति की नियुक्ति। कुरुक्षेत्र में पांडवों की सेना का प्रवेश।-(वही, अध्याय-151)
सेना को रसद पहुंचाने के लिए पांडवों की व्यवस्था के विवरण।-(वही, अध्याय-152)
कौरवों की ओर प्रबंध। हमारी सेना को कल प्रातः ही कुरुक्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए।-(वही, अध्याय-153)
धर्म को यह भय है कि वह युद्ध करने के लिए गया तो वह अपने नैतिक औचित्य से गिर जाएगा। कृष्ण ने उसे संतुष्ट किया। अर्जुन ने कहा कि तुम्हें युद्ध करना चाहिए।-(वही, अध्याय-154)
दुर्योधन की सेना का विवरण।-(वही, अध्याय-155)
भीष्म को कौरव सेना का सेनापति बनाया गया।-(वही, अध्याय-156)
कर्ण इससे नाराज होते हैं। वह निर्णय करता है कि भीष्म की मृत्यु होने तक वह कौरव सेना की बागडोर नहीं संभालेगा।
कृष्ण पांडवों की सेना के सेनापति बन जाते हैं।-(वही, अध्याय-157)
बलराम तीर्थयात्रा पर यह कहकर चले जाते हैं कि मैं कौरवों को नष्ट होते नहीं देखना चाहता।
रुक्मिणी को न तो अर्जुन चाहता है और न दुर्योधन चाहता है अतः वह घर चली जाती है।-(वही, अध्याय-158)
संजय और धृतराष्ट्र के बीच वार्तालाप। वह धृतराष्ट्र को दोषी ठहराता है।-(वही, अध्याय-159)
पांडवों की सेना हिरण्यवती नदी के किनारे ठहरी हुई है। दुर्योधन पांडवों को आक्रमण के लिए ललकारता है और कृष्ण कहते हैं कि यदि तुम युद्ध कर सकते हो तो युद्ध करो।-(वही, अध्याय-160)
उल्का संदेश लेकर जाता है।-(वही, अध्याय-164)
क्रोधित पांडव गुस्से से भरे संदेश भेजते हैं। वे कल से युद्ध आरंभ करने का आदेश देते हैं।-(वही, अध्याय-162)