11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 295

280 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

इसकी पांडुलिपि में टाइप किए हुए तेंतालीस फुलस्केप पृष्ठ हैं।

इसके मूल शीर्षक ‘ब्राह्मिन्स एंड क्षत्रियाज एंड दि काउंटर-रिवोल्यूशन’

(ब्राह्मण व क्षत्रिय तथा प्रतिक्रांति) के कवर पर डॉ. अम्बेडकर द्वारा

संशोधित शीर्षक ‘ब्राह्मिन्स वर्सेज क्षत्रियाज’ (ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय)

दिया गया है। यह निबंध पूर्ण लगता हैµसंपादक

हिंदुओं के धर्मग्रंथों में ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच अनेक संघर्षों के वृत्तांत मिलते हैं, यहां तक कि इन संघर्षों में अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए एक-दूसरे का रक्तपात भी किया गया मिलता है।

जो सबसे पहला उल्लेख मिलता है, वह राजा वेन का है। वेन एक क्षत्रिय राजा था। ब्राह्मणों के साथ उसके संघर्ष का उल्लेख अनेक लेखकों ने किया है। निम्नलिखित वृत्तांत हरिवंश से लिया गया है।

फ्प्राचीन-काल में अत्रि के गोत्र में प्रजापति (प्राणियों का स्वामी), धर्म का रक्षक हुआ जिसका नाम अंग था। ख्1, उसका उस जैसा ही पुत्र था, जिसका नाम प्रजापति वेन था। उसकी मां का नाम सुनीता था, जो मृत्यु की पुत्री थी। वह धर्म के प्रति उदासीन था। मृत्यु की पुत्री के इस पुत्र ने अपने नाना से प्राप्त दोष के कारण अपने धर्म की उपेक्षा की, और माया के वशीभूत हो आसक्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करने लग गया। इस राजा ने धर्मविहीन आचरण की पद्धति प्रतिष्ठित की, वेदोक्त मर्यादा का उल्लंघन कर वह न्यायविहीन कार्यों में रुचि रखने लगा। इसके शासन में लोग धर्मग्रंथों का अध्ययन न करते हुए और यज्ञ के अंत में होतृ द्वारा उच्चरित होने वाले मंत्रादि के बिना जीवनयापन करने लगे, जिससे देवताओं को यज्ञ में होमे गए सोम का पान होना समाप्त हो गया।य्

‘कोई भी यज्ञ या पूजा नहीं होगी - यह उस प्रजापति का कठोर संकल्प था। उसका विनाश निकट आ रहा था। उसने घोषणा की - मैं यज्ञ में आराध्य हूं, यज्ञ भी

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 302-303