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ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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मैं हूं, मेरे लिए यज्ञ अर्पित किया जाए तथा मेरे लिए ही नैवेद्य अर्पित किया जाए। धर्म की मर्यादाओं का अतिक्रमण वाले राजा से, जो अपने लिए उस पद का दंभ करने लगा जिसका वह पात्र नहीं था, तब मरीचि के नेतृत्व में सभी बड़े-बड़े ऋषियों ने उससे कहा, ‘हम सब एक महान (दीर्घसत्र) यज्ञ करने जा रहे हैं जो अनेक वर्षों तक चलेगा। हे वेन, आप अधर्म का आचरण न करें, यह धर्म की सनातन रीति नहीं है। निस्संदेह, आप हर दृष्टि से अत्रि वश्ां के प्रजापति हैं और आपने प्रजा की रक्षा करने का दायित्व लिया है।’ जब इन बड़े-बड़े ऋषियों ने इस प्रकार कहा तब उस मूर्ख वेन ने, जिसे उचित अनुचित का विवेक नहीं था, उन पर हंसकर कहा, ‘मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन धर्म का नियामक है? इस पृथ्वी पर वेद, वीर्य, तप और सत्य में मेरे समान दूसरा कौन है? आप लोग मोहग्रस्त और विवेकहीन हैं और यह नहीं जानते कि मैं ही सभी जीवों और धर्मों का उत्पत्ति स्थल हूं। आपको ज्ञात होना चाहिए कि यदि मैं चाहूं तो इस पृथ्वी को उलट-पलट दूं या इसे जल से आप्लावित कर दूं या आकाश और पृथ्वी को मिलाकर एक कर दूं।’ जब वेन अपने मोह और दंभ के कारण वश में नहीं किया जा सका, तब सभी ऋषि क्रोध में भर उठे। उन्होंने उस बलवान और दुर्धर्ष राजा को पकड़ लिया और उसकी बाईं जांघ को रगड़ डाला। इस जांघ के रगड़े जाने पर इससे श्याम वर्ण का एक पुरुष प्रकट हुआ, जो ठिगना था। वह डरा हुआ था। वह हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। अत्रि ने उसे भय से कांपता हुआ देख उससे कहा, ‘निषीथ’ (बैठ जाओ)। वह निषाद वंश का प्रवर्तक हुआ और धीवरों का जनक भी हुआ, जो वेन के विकार से उत्पन्न हुए।’

दूसरा उदाहरण पुरुरवा का है। वह एक और क्षत्रिय राजा था। वह इला का पुत्र और मनु वैवस्वत का पौत्र था। उसका ब्राह्मणों के साथ संघर्ष हो गया। इस संघर्ष का विवरण महाभारत के आदि पर्व में मिलता है जो निम्नलिखित हैः

‘इसके बाद इला से मेधावी पुरुरवा का जन्म हुआ। ख्1, जैसा कि हमने सुना है, वह उसकी माता भी थी और पिता भी। उसने महासागर में तेरह द्वीपों में राज्य किया। उसकी सारी प्रजा देव थी। वह स्वयं भी प्रख्यात था। पुरुरवा को सत्ता का मद हो गया। तब उसने ब्राह्मणों से बैर मोल ले लिया और भारी प्रतिरोध के बावजूद भी उसने उनके सारे रत्न छीन लिए। इस पर स्वर्ग से सनतकुमार आए और उन्होंने उसे चेतावनी दी, जिसे उसने अनसुनी कर दिया। इस पर ब्राह्मणों ने कु्रद्ध होकर उसे शाप दिया। जिसके परिणामस्वरूप शक्ति के मद में विमूढ़ हुए इस राजा की मृत्यु हो गई।’

तीसरा संघर्ष नहुष और ब्राह्मणों के बीच हुआ जो कुछ अधिक गंभीर था। नहुष पुरुरवा का पौत्र था। महाभारत में इसका दो स्थानों पर उल्लेख है। एक बार वन पर्व में

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 307