11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 297

282 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और दूसरी बार उद्योग पर्व में। निम्नलिखित विवरण महाभारत के उद्योग पर्व से लिया गया हैः

‘वृत्रासुर वध के पश्चात् इंद्र को ग्लानि हुई कि उन्होंने एक ब्राह्मण की हत्या कर दी है। ख्1, (क्योंकि वृत्र को ब्राह्मण कहा जाता था) इस कारण वह जल में छिप गया। देवराज के लुप्त हो जाने पर स्वर्ग और पृथ्वी, सभी जगह अव्यवस्था फैल गई। ऋषियों और देवताओं ने तब नहुष से राजा बनने के लिए निवेदन किया। आरंभ में उसने स्वयं को निर्बल बताकर अनिच्छा प्रकट की, किंतु उनके बहुत कहने पर उसने यह उच्च पद ग्रहण कर लिया। इस पद की प्राप्ति से पूर्व वह सद्जीवन व्यतीत करता था। किंतु अब वह भोग और विलास में लिप्त रहने लगा। यहां तक कि वह इंद्र की पत्नी इंद्राणी को पाने की भी कामना करने लगा, जिसे उसने संयोगवश देख लिया था। रानी अंगिरस बृहस्पति की शरण में गई, जो देवताओं के गुरु थे। उन्होंने उसे अभयदान दिया। इस हस्तक्षेप के विषय में सुनकर नहुष उत्तेजित हो उठा। परंतु देवताओं ने उसे शांत कर दिया और परस्त्री गमन के दोषों की ओर संकेत किया, परंतु उसने एक न मानी और कामासक्त नहुष अपनी बात पर अड़ा रहा कि इस संबंध में वह स्वयं इंद्र से घटकर नहीं था।’

‘इंद्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ ऋषि के जीवित रहते हुए दुराचार किया था। ‘तुमने उसे रोका क्यों नहीं? इंद्र ने अन्य अनेक पाशविक और अधार्मिक कृत्य किए हैं, उसने अनेक छल प्रपंच किए हैं। तब तुमने उसे क्यों नहीं रोका?’ नहुष के कहने पर वे तब इंद्राणी को लाने गए। परंतु बृहस्पति ने उसे नहीं सौंपा। बृहस्पति के कहने पर इंद्राणी ने नहुष को कुछ मोहलत देने के लिए राजी कर लिया कि वह अपने पति की खोज-खबर कर ले। यह अनुरोध स्वीकार कर लिए जाने पर वह अपने पति की खोज पर निकल पड़ी और उपश्रुति (रात्रि की देवी और रहस्य उद्घाटक) की सहायता से उसने हिमालय के उत्तर में जाकर इंद्र को ढूंढ़ लिया, जो वहां पर महासागर में स्थित एक महाद्वीप में स्थित एक झील में उग रहे कमल की नाल में अत्यंत सूक्ष्म रूप में छिपा हुआ बैठा था। उसने नहुष की कुत्सित मनोवृत्ति के विषय में इंद्र को बताया और उससे कहा कि वह अपनी शक्ति का उपयोग करे और उसकी रक्षा करे। नहुष की अधिक शक्ति को देखते हुए इंद्र ने तुरंत कोई कदम उठाने से मना कर दिया। परंतु उसने अपनी पत्नी को एक सुझाव दिया, जिसके अनुसार नहुष को उसके पद से नीचे गिराया जा सकता था। उसने उससे यह कहा कि वह नहुष से यह कहे कि वह उस पालकी पर चढ़कर आए जिसे ऋषि ढो रहे हों, तो वह उसके सम्मुख स्वयं को सहर्ष समर्पित कर देगी।’

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 310-313