284 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
होना चाहिए क्योंकि ब्राह्मणों का शत्रु नष्ट हो गया है। तुम तीनों लोकों की सत्ता संभालो। वहां के प्राणियों की रक्षा करो। हे शचीपति, अपनी इंद्रियों को वश में रख अपने शत्रुओं का नाश करो और ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करो।’
चौथा उदाहरण निमि का है। निमि इक्ष्वाकु के पुत्रों में से एक था। ब्राह्मणों के साथ उसके संघर्ष का वर्णन विष्णुपुराण में मिलता है, जो इस प्रकार हैः
‘निमि ने ब्रह्मर्षि वशिष्ठ से एक यज्ञ का पौरोहित्य करने का अनुरोध किया, जो एक सहस्त्र वर्ष तक चलने वाला था। ख्1, वशिष्ठ ने उत्तर दिया, मैंने पहले ही इंद्र को एक यज्ञ का पौरोहित्य करने का वचन दे रखा है, जो पांच सौ वर्ष तक चलेगा। राजा ने कुछ भी नहीं कहा। वशिष्ठ चले गए और उन्होंने यह अनुमान लगाया कि राजा ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। लौटने पर उन्होंने देखा कि निमि ने यज्ञार्थ गौतम (जो वशिष्ठ के समान ब्रह्मर्षि थे) और अन्य ऋषियों को नियुक्त कर रखा है। उनको राजा की ओर से इस बात की कोई सूचना नहीं दी गई थी यह देखकर उन्हें क्रोध हो आया। उन्होंने राजा को जो उस समय सोया हुआ था, शाप दिया कि उसका शरीरांत हो जाए। जब निमि जागे तब उन्हें पता चला कि उन्हें बिना किसी सूचना दिए शाप दिया गया है। उन्होंने वशिष्ठ को ऐसा ही शाप देकर उसका प्रतिकार किया और वह मृत्यु को प्राप्त हो गए। निमि के शरीर को सुरक्षित रख दिया गया। जिस यज्ञ को निमि ने शुरू किया था, उसकी समाप्ति के बाद देवताओं ने ऋषियों के अनुरोध पर यह इच्छा प्रकट की कि निमि को पुनरुज्जीवित कर दिया जाए। लेकिन निमि ने इसे अस्वीकार कर दिया। तब देवताओं ने निमि को उसकी इच्छा के अनुसार सभी जीवित प्राणियों की आंखों में प्रस्थापित कर दिया। इसी कारण सभी प्राणी अपनी आंखें खोलते और बंद करते हैं। (निमिष का अर्थ पलक का उठना और गिरना होता है)।’
पांचवां प्रसंग वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच विवाद का है। वशिष्ठ ब्राह्मण पुरोहित थे और विश्वामित्र एक क्षत्रिय थे। उनकी हार्दिक इच्छा ब्रह्मर्षि बनने की थी। निम्न उद्धरण रामायण से है जिससे यह पता चलता है कि वह ब्रह्मर्षि क्यों बनना चाहते थे। ‘कहते हैं कि प्राचीन काल में कुश नाम का एक राजा था। ख्2, वह प्रजापति का पुत्र था। कुश का एक पुत्र था, जिसका नाम कुशनाभ था। वह गाधि का पिता था। गाधि विश्वामित्र का पिता था। विश्वामित्र ने सहस्त्रों वर्ष पृथ्वी पर राज्य किया। एक बार जब वह पृथ्वी की प्रदक्षिणा कर रहा था, वह वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में पहुंचे जहां अनेक संत, ऋषि, मुनि और भक्त सुखपूर्वक रहते थे। उसे पहले तो वहां ब्रह्मा के पुत्र का आतिथ्य ग्रहण करने में संकोच हुआ, किंतु बाद में उसने अपने साथियों सहित उनका आतिथ्य ग्रहण कर लिया। विश्वामित्र
म्यूर, खंड 1, पृ. 316
वही, खंड 1, पृ. 397-400