11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 300

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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उनकी विलक्षण गौ पर मुग्ध हो गया, जिसने सभी को भोजन में स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध कराए थे। विश्वामित्र ने पहले तो यह कहा कि एक लाख गौ के बदले वह गौ उनको सौंप दी जाए। उसने कहा कि यह गौ रत्न-स्वरूप है और चूंकि रत्न राजा की संपत्ति होती है अतः इस गौ पर उसका अधिकार है। जब इस कीमत को स्वीकार नहीं किया गया, तब राजा ने और भी कीमत देने का प्रस्ताव रखा। लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा। तब वह कृतघ्नतापूर्वक और बलपूर्वक बोला कि यह गौ उसे ले जाने दी जाए, वह बलपूर्वक इस गौ को ले जाएगा। जब वह ऐसा करने लगा, तब वह गौ उसके परिचारकों से अपने को छुड़ाकर अपने स्वामी के पास आ गई और उससे बोली - तुम मुझे त्याग रहे हो। उसने उत्तर दिया कि वह उसे नहीं त्याग रहा है, लेकिन राजा उससे कहीं अधिक शक्तिशाली है। गौ ने उत्तर दिया, ‘लोग क्षत्रिय को बलशाली नहीं समझते। ब्राह्मण अधिक शक्तिशाली होते हैं। ब्राह्मणों का बल अतुलनीय है। विश्वामित्र यद्यपि बहुत शक्तिशाली हैं, लेकिन वह आपसे अधिक शक्तिशाली नहीं हैं। आपमें अपूर्व बल है। आप मुझे ले चलें। आपने ब्रह्मशक्ति से बल अर्जित किया है। मैं इस दुराचारी राजा के गर्व, शक्ति और प्रयत्नों को विफल कर दूंगी।’ उसने रंभा-रंभा कर सैंकड़ों पहल्व पैदा कर दिए, जिन्होंने विश्वामित्र के समस्त दल का नाश कर दिया। ये पहल्व विश्वामित्र द्वारा एक-एक कर मौत के घाट उतार दिए गए। तब उसने शक और यवन पैदा किए, जो अत्यंत बलशाली और सशस्त्र भी थे। उन्होंने राजा की सेना का संहार कर दिया। राजा ने इन्हें भी पछाड़ दिया। तब उस गौ ने रंभा कर अपने शरीर से विभिन्न जातियों के योद्धा उत्पन्न कर दिए। इन योद्धाओं ने विश्वामित्र की सारी सेना, पदातिकों, हाथियों, अश्वों, रथों आदि को नष्ट कर दिया। तब राजा के सैंकड़ों पुत्र विभिन्न शस्त्र धारण कर क्रोध में भर वशिष्ठ की ओर झपटे, लेकिन वे सभी ऋषि के मुख से निकलने वाली आग में झुलस कर भस्म हो गए। विश्वामित्र इस प्रकार अब निस्सहाय हो गया। उसने अपने एक पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बना दिया और वह हिमालय की ओर चला गया, जहां वह तप करने लग गया। उसने वहां भगवान शंकर के दर्शन किए। उन्होंने उसकी प्रार्थना पर उसे युद्धकला की विभिन्न शाखाओं-प्रशाखाओं की शिक्षा दी और दैवी अस्त्र प्रदान किए, जिनके बल पर उसने वशिष्ठ के आश्रम को उजाड़ डाला और वहां के निवासी भागने लगे। वशिष्ठ ने तब विश्वामित्र को चुनौती दी और उन्होंने अपने ब्रह्मदंड को उठा लिया। विश्वामित्र ने भी अपने आग्नेयास्त्र को उठा लिया और अपने शत्रु को ललकारा। वशिष्ठ ने उसे अपनी शक्ति के प्रदर्शन की चुनौती दी और कहा कि वह उसके गर्व को शीघ्र चूर्ण कर देंगे। वह बोले, ‘क्षत्रिय के बल और ब्राह्मण के बल में यह तुलना कैसी? नीच क्षत्रिय, मेरा ब्रह्मतेज देख। तब गाधि के पुत्र के द्वारा फेंका गया आग्नेयास्त्र ब्राह्मण के दंड से परास्त हो गया, जैसे अग्नि जल से शांत हो जाती है। विश्वामित्र द्वारा तब बहुत से दैवी प्रक्षेपास्त्र, जैसे ब्रह्मपाश, कालपाश, वरुणपाश और विष्णु चक्र तथा शिव का त्रिशूल अपने शत्रु पर फेंके गए। लेकिन ब्रह्मा के पुत्र ने