11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 301

286 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इन सभी को अपनी प्रबल गदा के आघात से चूर्ण कर दिया। अंत में उस योद्धा ने ब्रह्मा का भयंकर अस्त्र फेंका, जिस पर सभी देवता स्तब्ध रह गए। यह अस्त्र भी ब्राह्मण ऋषि का कुछ न कर सका। वशिष्ठ ने अब रौद्र रूप धारण कर लिया था। उनके शरीर के हर छिद्र से अग्नि और धुआं निकल रहा था। उनके हाथ में ब्रह्मदंड निर्धूम अग्नि पिंड या यमराज का दंड जैसा लग रहा था। ऋषि-मुनियों द्वारा शांत किए जाने पर, जिन्होंने उनको अपने प्रतिद्वंद्वी से श्रेष्ठ घोषित किया, वशिष्ठ ने अपने क्रोध को शांत किया। विश्वामित्र तब कराहते हुए बोला, क्षत्रिय के बल को धिक्कार है। ब्राह्मण की शक्ति ही शक्ति है। ब्राह्मण के एक ही दंड द्वारा मेरे समस्त शस्त्रास्त्र नष्ट हो गए।

‘इस प्रकार पराजित राजा के लिए इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता कि वह इस असहाय, हीन अवस्था में मौन धारण कर ले, या वह ब्रह्मत्व के पद को प्राप्त करने के लिए अपनी उन्नति का प्रयत्न करे। उसने अंतिम विकल्प को चुना। ‘इस पराभव पर पूर्ण विचार कर मैं अपनी इंद्रियों और चित्त को अपने वश में कर कठोर तप करूंगा, जो मुझे ब्राह्मणत्व के पद पर ले जाएगा।’ वह अत्यंत विषण्ण तथा संतप्त हो अपने शत्रु के प्रति घृणा का भाव भर आर्तनाद करता अपनी पत्नी के साथ दक्षिण की ओर चला आया और अपने संकल्प को पूरा करने लग गया। एक सहस्त्र वर्ष बाद ब्रह्मा प्रकट हुए और उन्होंने यह घोषणा की कि उसने राजर्षि का पद प्राप्त कर लिया है। उसकी कठोर तपस्या के फलस्वरूप लोग उसे राजर्षि के पद को प्राप्त हुआ समझने लगे।’

ऐसा प्रतीत होता है कि यह संघर्ष सुदास नाम के राजा के शासनकाल में शुरू हुआ था, जो इक्ष्वाकु वंश के थे। वशिष्ठ सुदास के कुल-पुरोहित थे। किसी कारण से, जो स्पष्ट नहीं, बताया जाता है कि सुदास ने विश्वामित्र को अपना कुल-पुरोहित नियुक्त कर दिया। इससे विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच बैर हो गया। एक बार यह बैर-भाव हो जाने पर दीर्घ समय तक चलता रहा।

दोनों के बीच इस संघर्ष ने विचित्र मोड़ ले लिया। यदि विश्वामित्र किसी विवाद में फंस जाते हैं तो वशिष्ठ बीच में आ कूदते और विश्वामित्र का विरोध करने लगते। वह एक-दूसरे को नीचा दिखाने जैसा कार्य था।

इस संबंध में पहली घटना सत्यव्रत से संबंधित है, जिसका एक नाम त्रिशंकु भी था। इस कथा का वर्णन हरिवंश में हुआ है, जो निम्नलिखित हैः

‘इस बीच वशिष्ठ राजा (सत्यव्रत के पिता) और अपने बीच यजमान और पुरोहित का संबंध होने के कारण अयोध्या नगर, राज्य और रनिवास का प्रबंध करने लग गए। ख्1, लेकिन सत्यव्रत या तो मूर्खतावश या दैवी प्रेरणा वश वशिष्ठ से निरंतर अधिकाधिक

  1. म्यूर खंड 1, पृ. 377-378