11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 302

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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कु्रद्ध रहने लगा, जिन्होंने उसके पिता को किसी (उचित) कारण से उसे राज्याधिकार से वंचित करने से नहीं रोका था। सत्यव्रत बोला - विवाह संस्कार तभी वैध होता है जब सप्तपदी हो जाए। जब मैंने उस सुंदरी का हरण किया था, तब यह सप्तपदी नहीं हुई थी, लेकिन वशिष्ठ ने, जो धर्म के नियम जानते हैं, मेरी कोई सहायता नहीं की। इस प्रकार सत्यव्रत मन ही मन वशिष्ठ के प्रति कु्रद्ध रहने लगा, जिन्होंने एक दृष्टि से वही किया जो उचित था। न सत्यव्रत ने अपने पिता द्वारा आरोपित मौन व्रत को (उसके औचित्य को) समझा... जब उन्होंने उस कठिन तप का समर्थन किया, तब उन्होंने यह समझा कि उन्होंने उसके परिवार की प्रतिष्ठा को बचा लिया है। पूज्य मुनि वशिष्ठ ने (जैसा कि ऊपर कहा गया है) उसके पिता को उसे राज्याधिकार से वंचित करने से नहीं रोका, बल्कि उन्होंने उसके पुत्र को राजा बनाने का निश्चय कर लिया। जब वह शक्तिमान राजकुमार बारह वर्षों की कठिन तपस्या पूरी कर रहा था और उसके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था, तभी उसकी दृष्टि वशिष्ठ की गौ पर पड़ी जो सभी प्रकार की मनोकामना पूरी करती है। उसने क्रोध, विभ्रम, दुर्बलता के वशीभूत और भूख से पीडि़त हो तथा दस कर्तव्यों की उपेक्षा कर उसकी हत्या कर दी...और उसका मांस अपने खाने के लिए रख लिया तथा कुछ मांस विश्वामित्र के पुत्र को भी खाने के लिए दिया। यह सुनकर वशिष्ठ उस पर कुपित हो गए और उन्होंने शाप देकर उसका नाम त्रिशंकु रख दिया, क्योंकि उसने तीन प्रकार के पाप किए थे। जब विश्वामित्र अपने आश्रम में लौटे, तब वह उस जीविका को देखकर संतुष्ट हुआ जो उसकी पत्नी को मिलती थी और उन्होंने त्रिशंकु से वर मांगने के लिए कहा। जब ऐसा कहा गया, तब त्रिशंकु ने सदेह स्वर्ग जाने का वर मांगा। बारह वर्षों तक अनावृष्टि के सभी कष्ट समाप्त हो गए। मुनि (विश्वामित्र) ने त्रिशंकु को उसके पिता की राजगद्दी पर बिठाया और उसके निमित्त यज्ञ किया। पराक्रमी कौशिक ने देवताओं और वशिष्ठ ख्1, द्वारा प्रतिरोध किए जाने के बावजूद राजा को सदेह स्वर्ग में प्रतिष्ठित कर दिया।’

हरिवंश के अनुसार

‘जो पापाचार किए गए थे, उनके परिणामस्वरूप इंद्र ने बारह वर्षों तक वृष्टि नहीं की। ख्2, उस समय विश्वामित्र अपनी पत्नी और पुत्रों को छोड़कर समुद्र तट पर तप करने चले गए। उनकी पत्नी अभावों से पीडि़त हो अपने दूसरे पुत्र को एक सौ गांवों के बदले

  1. जैसा कि हरिवंश में एक दूसरी जगह वर्णन आता है कि त्रिशंकु को उसके पिता ने कुवासना से प्रेरित होकर

एक नागरिक की पत्नी का हरण करने के अपराध में घर से बाहर कर दिया और वशिष्ठ ने इस निष्कासन

को रोकने के लिए कोई भी हस्तक्षेप नहीं किया। यह प्रसंग इसी ओर संकेत करता है। 2. म्यूर, खंड 1, पृ. 376-377