11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 303

288 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बेचना चाहती थी, जिससे वह अन्य पुत्रों का भरण-पोषण कर सके। लेकिन सत्यव्रत के द्वारा बीच में हस्तक्षेप करने पर ऐसा न हो सका। सत्यव्रत ने उसके पुत्र को छुड़ा लिया और उनके परिवार को जंगली पशुओं का मांस देकर उनकी रक्षा की और अपने पिता की आज्ञा के अनुसार बारह वर्षों तक कठिन तप किया।

जिस दूसरी घटना में इन दोनों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी दिखाया गया है, वह त्रिशंकु के पुत्र हरिश्चन्द्र की है। यह कथा विष्णुपुराण और मार्कण्डेय पुराण में आती है। यह कथा इस प्रकार हैः

‘एक बार जब राजा शिकार खेल रहा था तब उसने किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनी जो ऐसा लगता था कि वह (आवाज) उन विधाओं (साइसेज) की थी, जिनको क्रोधोन्मत्त तपस्वी ऋषि विश्वामित्र उस रीति से अपने अधिकार में कर लेना चाहते थे, जिस रीति से किसी ने भी नहीं किया था। और इसलिए ये विधाएं उनके बल से भयभीत होकर विलाप कर रही थीं। निर्बल की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म होता है। इस कारण, और गणेश देवता से प्रेरित हो, जो उसके शरीर में प्रवेश कर गए थे। हरिश्चन्द्र ने कहा - ‘कौन पापी है जो मुझे बल और तेजस्विता से दीप्तमान के रहते अपने वस्त्रों में आग लगा रहा है। शीघ्र ही उसके अंग-प्रत्यंग को मेरे धनुष से निकलने और समस्त आकाश को प्रदीप्त करने वाले बाण बेधकर रख देंगे और वह चिर निंद्रा में सो जाएगा।’ यह चुनौती सुनकर विश्वामित्र उत्तेजित हो उठे। उनके क्रोध के परिणामस्वरूप सभी विधाएं मृत हो गईं, और हरिश्चन्द्र अश्वत्थ वृक्ष के पत्ते की तरह कांपते हुए विनयपूर्वक बोले कि मैंने तो राजा के रूप में केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है जो इस प्रकार वर्णित है - श्रेष्ठ ब्राह्मणों और अल्प साधन वाले व्यक्तियों को दान देना, निर्बल की रक्षा करना और शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध करना। विश्वामित्र तब उससे ब्राह्मण के रूप में दान मांगते हैं और एक ही वस्तु के मिलने पर मनु संतुष्ट होने की बात करते हैं। राजा उन्हें वचन देता है कि वह अपनी इच्छानुसार इन वस्तुओं में से कोई भी वस्तु चुन लें - सुवर्ण, पुत्र, पत्नी, काया, राज्य, सौभाग्य। ऋषि पहले तो राजसूय यज्ञ के लिए दान मांगते हैं। राजा के स्वीकार करने और अन्य वस्तुएं भी दान करने का वचन देने पर ऋषि उनसे उनको, उनकी पत्नी व पुत्र को छोड़कर समस्त पृथ्वी पर स्थित राज्य मांगते हैं, जिसमें शेष सभी कुछ शामिल होगा। वह उनसे उनकी समस्त संपत्ति मांगते हैं जो उनके पास है या जहां भी वह जाएंगे तब उनके पास होगी। हरिश्चन्द्र सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। विश्वामित्र तब उनसे अपने समस्त आभूषण उतारने, वल्कल वस्त्र पहनने और पत्नी शैव्या तारामती तथा पुत्र सहित राज्य छोड़ने के लिए कहते हैं। जब वह जाने लगते हैं, तब ऋषि उनको रोकते हैं और उनसे दान की दक्षिणा मांगते हैं जो उन्हें अभी

  1. म्यूर खंड 1, पृ. 376-377