11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 304

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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तक नहीं मिली है। राजा उत्तर देते हैं कि उनके पास उनकी पत्नी और पुत्र को छोड़कर कुछ भी नहीं है। विश्वामित्र राजा से कहते हैं कि उन्हें तो दक्षिणा देनी ही होगी। और ब्राह्मणों को दान देने की प्रतिज्ञा पूरी न करने पर उनका विनाश हो जाएगा। अभगा राजा इस प्रकार धमकाए जाने पर एक महीने की अवधि में दक्षिणा चुकता कर देने का वचन देता है और अपनी प्रजा को बिलखता छोड़कर अपनी पत्नी के साथ यात्रा पर निकल पड़ता है, जिसने ऐसे कष्ट पहले कभी नहीं भोगे थे। जब वह राज्य छोड़ते समय अपने पुरजनों के विलाप पर कुछ देर के लिए रुकता है, तब विश्वामित्र आते हैं और राजा के द्वारा देर करने और रूकने पर क्रुद्ध होकर अपने दंड से रानी पर प्रहार करते है और राजा अपनी पत्नी को उसका हाथ खींचते हुए आगे निकल जाते हैं। इसके बाद हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी और पुत्र के साथ यह सोचकर काशी आते हैं कि यह तो शिव की संपत्ति होने के कारण पावन नगरी है और यह किसी मर्त्य के अधिकार में नहीं होगी। यहां वह देखता है कि निष्ठुर विश्वामित्र उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं और अनुग्रह की अवधि के पूरी होने के पूर्व ही दक्षिणा देने का हठ करने के लिए तैयार खड़े हैं। इस विकट स्थिति में रानी शैव्या सिसकते हुए राजा से कहती है कि वह उसे बेच दें। यह प्रस्ताव सुनकर राजा मूर्छित हो जाता है। यह देखकर उसकी पत्नी भी मूर्छित हो जाती है। जब ये दोनों मूर्छित पड़े हुए होते हैं, तभी उनका भूख से पीडि़त पुत्र भी कष्ट से चिल्लाने लगता है, पिताजी! पिताजी! मुझे रोटी दो, मां! मां! कुछ भोजन दो। मैं भूख से व्याकुल हूं। मेरी जीभ भी सूख रही है। इसी बीच विश्वामित्र वहां वापस आते हैं और हरिश्चन्द्र के शरीर पर जल छिड़क कर उसे होश में लाते हैं तथा दक्षिणा देने के लिए पुनः पुनः हठ करते हैं। राजा फिर बेहोश हो जाता है, वह पुनः होश में लाया जाता है। ऋषि उसे धमकाते हैं और कहते हैं कि अगर वह सूर्यास्त होने के पूर्व अपनी प्रतिज्ञा पूरी नहीं करेगा तो वह उसे शाप दे देंगे। अपनी पत्नी के बार-बार अनुरोध करने पर रजा उसे बेच देने के लिए राजी हो जाता है और कहता है, ‘यदि मैं इतने निकृष्ट शब्द का उच्चारण कर सकता हूं तब कू्रर और अभागे क्या कुछ नहीं कर सकते।’ वह फिर नगर में जाता है और अपने को कोसता हुआ अपनी रानी को दासी के रूप में बेचने के लिए बोली लगाता है। एक धनाढ्य वृद्ध ब्राह्मण उसकी बोली लगाता है तथा उसकी कीमत देकर अपने घर में दासी के रूप में रख लेता है। उसका पुत्र अपनी मां को ले जाता हुआ देखकर उसके पीछे-पीछे रोता और मां-मां चिल्लाता हुआ भागता है। जब वह अपनी मां के पास आता है, तब वृद्ध ब्राह्मण, जिसने उसकी मां को खरीदा है, उसे लात मारता है। लेकिन वह अपनी मां को आगे जाने नहीं देता और लगातार मां-मां चिल्लाता है। रानी तब ब्राह्मण से कहती है, ‘दया कीजिए, मेरे स्वामी। इस बच्चे पर भी दया कीजिए। उसके बिना मैं आपके किसी काम न आ सकूंगी। मेरी दीनता पर दया कीजिए। मुझे मेरे पुत्र से अलग मत कीजिए, जैसे गौ को उसके बछड़े से अलग नहीं किया जाता है। ब्राह्मण मान जाता