290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है और कहता है, ‘यह धन लो और इस लड़के को मुझे सौंप दो। जब ब्राह्मण अपनी
खरीदी हुई संपत्ति को लेकर दूर चला जाता है, तब विश्वामित्र पुनः आते हैं और अपनी मांग दुहकराते हैं। जब विपत्तिग्रस्त हरिश्चन्द्र उस थोड़े से धन को, जो उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र को बेचने से प्राप्त हुआ था, विश्वामित्र को देते हैं, तब वह कु्रद्ध होकर कहते हैं - दुष्ट क्षत्रिय, यदि तुम यह समझते हो कि यह दक्षिणा मेरे उपयुक्त है, तब तुम मेरे कठोर तप, निष्कलंक ब्रह्मत्व, पुण्य, प्रताप और मेरे वेदाध्ययन की शुचिता का शीघ्र अनुभव करोगे। हरिश्चन्द्र उन्हें और दक्षिणा देने का वचन देते हैं और विश्वामित्र उन्हें उस दिन के शेष समय में चुकता करने की अनुमति देते हैं। भयभीत और त्रस्त राजा जब अपने को बेचना चाहता है, तब वीभत्स और क्रूर चांडाल के रूप में धर्म प्रकट होते हैं और जो भी कीमत राजा अपनी लगाता है, उस पर उसे खरीदने के लिए तैयार हो जाते हैं। हरिश्चन्द्र इस निकृष्ट कर्म को करने से इंकार कर देते हैं और कहते हैं कि इस दुर्भाग्य को स्वीकार करने की अपेक्षा, वह अपने उत्पीड़क के शाप की अग्नि में भस्म हो जाना श्रेयस्कर समझते हैं। विश्वामित्र पुनः आते हैं और कहते हैं कि वह चांडाल द्वारा कीमत के रूप में दिए जा रहे प्रचुर धन को क्यों नहीं स्वीकार कर लेते। जब हरिश्चन्द्र यह कारण बताते हैं कि वह सूर्यवंश की संतान है। तब विश्वामित्र उन्हें यह कहकर धमकाते हैं कि अगर वह अपने वचन को उक्त धनराशि स्वीकार कर पूरा नहीं करते, तब वह उन्हें शाप दे देंगे। हरिश्चन्द्र अनुनय करते हैं कि उन्हें यह नीच कर्म करने के लिए बाध्य न किया जाए और अपने ऋण को चुकाने के लिए वह विश्वामित्र का दास बनने के लिए तैयार हैं। इस पर ऋषि कहते हैं - ‘अगर तुम मेरे दास हो तब, मैं तुम्हें इसी रूप में एक लाख मुद्राओं के बदले चांडाल को बेचता हूं।’
‘चांडाल सहर्ष यह धन चुकता कर देता है और दुःखी हरिश्चन्द्र को अपने निवास स्थान पर ले जाता है। चांडाल उसे श्मशान जाकर कफन चुराने का काम करने के लिए कहता है। वह बताता है कि इससे उसे 2/6 भाग प्राप्त होगा जो उस (चांडाल) का होगा और 1/6 भाग राजा को मिलेगा। राजा ने इस भयानक क्षेत्र में नीच कर्म करते हुए बारह वर्ष व्यतीत किए, जो उसे सौ वर्षों के बराबर लगे। वह तब सो जाता है। उसे अपने जीवन के विषय में अनेक स्वप्न आए। जब वह जागा तब उसकी पत्नी अपने पुत्र का अंतिम संस्कार कराने आई, जो सर्पदंश से मर गया था। पहले तो पति-पत्नी ने एक-दूसरे को नहीं पहचाना, क्योंकि उनकी आकृति कष्ट सहते-सहते विकृत हो गई थी। हरिश्चन्द्र ने उसके विलाप से तुरंत पहचान लिया कि यह उसकी पत्नी ही है, जो दुर्भाग्य की मारी हुई है। वह बेहोश हो जाता है। रानी भी उसे पहचान लेती है, वह भी बेहोश हो जाती है। जब उनकी मूर्छा भंग होती है, तब वे दोनों रोने लगते हैं। पिता अपने पुत्र की मृत्यु पर और रानी अपने पति की अधोगति पर रोती है। वह उसके गले से लिपट जाती है और कहती है, ‘मैं विभ्रम में हूं, क्या यह स्वप्न है या यथार्थ है?