11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 306

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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यदि यह यथार्थ है, तब उन्हें धर्म का बोध हो रहा है, जो इसका आचरण करते हैं।’ हरिश्चन्द्र को अपने पुत्र की चिता में आग लगाने से पहले स्वामी के लिए शुल्क न लेने के लिए हिचक होती है, लेकिन बाद में वह हर परिणाम को भुगतने और ऐसा करने का निश्चय कर लेता है और अपने को ढाढस दिलाता है कि ‘यदि मैंने दान दिए हैं और ऋषि-मुनियों को मेरे यज्ञ-कर्म आदि से संतोष हैं, तब मैं स्वर्ग में अपने पुत्र और अपनी पत्नी से जाकर मिलूंगा।’ रानी भी उसी प्रकार मरने का निर्णय कर लेती है। जब हरिश्चन्द्र अपने पुत्र को चिता पर रखकर भगवान श्री नारायण कृष्ण, परमात्मा का स्मरण और ध्यान कर रहे थे, तभी धर्म के आगे-आगे सभी देवतागण विवामित्र के साथ वहां उपस्थित हो गए। धर्म राजा को आवेश में कठोर कर्म करने से वर्जित करने लगे। इंद्र ने घोषणा की कि राजा, उसकी पत्नी और उसके पुत्र ने अपने सत्कर्म से स्वर्ग जीत लिया है। देवताओं ने आकाश से अमृत व पुष्पों की वर्षा की और राजा का पुत्र पुनः जीवित हो उठा तथा स्वरथ हो गया।

‘स्वर्गिक वस्त्र और मालाओं से आभूषित हो राजा और रानी ने अपने पुत्र को गले लगा लिया। हरिश्चन्द्र ने कहा कि जब तक मुझे अपने स्वामी चांडाल की अनुमति नहीं मिल जाती और उनको प्रचुर धन नहीं दे देता, तब तक मैं स्वर्ग नहीं जा सकता। धर्म तब राजा को यह रहस्य बताते हैं कि मैंने स्वयं ही चांडाल का स्वरूप धारण कर रखा था। तब राजा पुनः कहता है कि मैं तब तक यहां से विदा नहीं ले सकता, जब तक मेरी प्रजा को मेरे साथ स्वर्ग चलने की अनुमति नहीं होती, क्योंकि मेरे पुण्य में उसका भी अंश है, चाहे वह एक दिन के लिए ही चले। इसे इंद्र स्वीकार करते हैं। विश्वामित्र राजा के पुत्र रोहिताश्व को राज-सिंहासन पर आसीन कराते हैं और तब हरिश्चन्द्र, उनके साथी और अनुयायी एक साथ स्वर्गारोहण करते हैं। इस चरमोत्कर्ष के बाद जब वशिष्ठ ने यह वृत्तांत गंगा के जल में बारह वर्षों तक निवास करने के बाद सुना, जो हरिश्चन्द्र के कुल पुरोहित थे, तो वह उस क्लेश के कारण बहुत कु्रद्ध हुए जो ऐसे श्रेष्ठ राजा को भोगना पड़ा, जिसके गुणों और ईश्वर तथा ब्राह्मण भक्ति की वह प्रशंसा करते थे। उन्होंने कहा कि जब विश्वामित्र ने उनके अपने सौ पुत्रों का वध किया था, तब उन्हें इतना क्रोध नहीं आया था। उन्होंने विश्वामित्र को बगुला बन जाने का शाप दे दिया। उन्होंने कहा कि वह दुष्ट व्यक्ति, ब्राह्मणद्रोही, मेरे शाप से बुद्धिमान जीवों के समाज से बहिष्कृत हो जाए तथा अपनी बुद्धि खोकर वक बन जाए। विश्वामित्र ने इसके बदले वशिष्ठ को शाप दे दिया और उन्हें अरि नामक पक्षी बना दिया। इन नए रूपों में दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अरि आकाश में दो सहस्त्र योजन अर्थात्-18,000 मील ऊपर उड़ सकता था और वक 3,090 योजन तक ही उड़ सकता था। जब अरि ने अपने पंजों से आक्रमण किया, तब वक ने अपने प्रतिद्वंद्वी पर वैसे ही आक्रमण किया। इन दोनों के डैनों की फड़फड़ाहट से भयंकर चक्रवात आए, पर्वत चूर्ण होने लगे, सारी पृथ्वी कांपने लगी, समुद्र में जल तट के ऊपर