11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 308

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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‘जब शुनःशेप को ये दो श्लोक प्राप्त हो गए, तब वह तुरंत अम्बरीष के पास गया और उससे तुरंत यज्ञ-स्थल के लिए चलने का आग्रह किया। जब उसे यज्ञ के खंभे से बांधा गया और उसे लाल वस्त्र पहनाए गए तो उसने इंद्र और उसके अनुज विष्णु की स्तुतियों में वे श्लोक पढ़े। सहस्राक्ष इंद्र इन गुप्त श्लोकों से प्रसन्न हुआ और उसने शुनःशेप को चिरंजीवी रहने का वरदान दिया।’

अंतिम प्रकरण, जिसमें इन दोनों की प्रतिद्वंद्विता का संकेत मिलता है, वह राजा कल्माषपाद से संबंधित हैं। इसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में इस प्रकार किया गया हैः

‘कल्माषपाद इक्ष्वाकु वंश का राजा था। विश्वामित्र उसके राजपुरोहित बनना चाहते थे, लेकिन राजा वशिष्ठ को चाहता था। एक बार जब राजा मृगया पर गया और उसने बहुत से पशु-पक्षियों का शिकार कर लिया, तब वह बहुत थक गया। उसे भूख और प्यास लग आई। उसने वशिष्ठ के सौ पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र शक्ति को रास्ते से हट जाने को कहा। ऋषि ने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘वह रास्ता मेरा है। हे राजन, सभी लोग कहते हैं कि राजा को चाहिए कि वह ब्राह्मण के लिए रास्ता खाली कर दे। यह अनादि नियम है।’ दोनों में से कोई पक्ष दूसरे को रास्ता देने को तैयार नहीं था। विवाद बढ़ता गया। तब राजा ने मुनि पर अंकुश चला दिया। मुनि ने जैसा कि अन्य मुनि कु्रद्ध होने पर कहते हैं, राजा को नरभक्षी हो जाने का शाप दे डाला। उस समय कल्माषपाद के पौरोहित्य पद को लेकर विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच शत्रुता चल रही थी। विश्वामित्र राजा के पीछे-पीछे चल रहे थे। जब राजा शक्ति के साथ विवाद में उलझा हुआ था तब, वह उसके पास गया। जब उसने अपने प्रतिद्वंद्वी के पुत्र को देखा तो वह छिप गया और मौके की तलाश में उनके पास से निकल गया। राजा शक्ति की अनुनय-विनय करने लगा, लेकिन विश्वामित्र उनमें समझौता नहीं होने देना चाहता था। अतः उसने एक राक्षस को आदेश दिया कि वह राजा के शरीर में प्रवेश कर ले। ब्रह्मर्षि के पाप और विश्वामित्र का आदेश, दोनों के प्रभाव से राक्षस ने आदेश का पालन किया। विश्वामित्र ने देखा कि उसका उद्देश्य पूरा हो गया, तब वहां से चल दिया। रास्ते में राजा को एक भूखा ब्राह्मण मिला। उसने अपने रसोइए के हाथों (जो कुछ अन्य वस्तुएं नहीं ला सकता था) खाने के लिए नरमांस भेजा। उसने उसे वैसा ही शाप दिया, जैसा शक्ति ने दिया था। अब तो शाप द्विगुणित हो गया। राजा के खा लेने के कारण शक्ति उसका पहला शिकार बना। विश्वामित्र की प्रेरणा से वशिष्ठ के अन्य पुत्रों को भी यही भोगना था। विश्वामित्र ने शक्ति को मरा हुआ देखकर राक्षस को वशिष्ठ के अन्य पुत्रों की ओर भी प्रेरित किया। इस प्रकार उस भयंकर राक्षस ने उन पुत्रों का भी भक्षण कर लिया, जो शक्ति से छोटे थे, जैसे कोई सिंह वन में छोटे-छोटे पशुओं का भक्षण कर लेते हैं। विश्वामित्र द्वारा अपने पुत्रों के किए गए विनाश को सुनकर वशिष्ठ ने धैर्य बनाए रखा, जैसे विशाल पर्वत को पृथ्वी धारण कर रखे हो। उन्होंने अपने ही नाश