11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 309

294 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का ध्यान किया, लेकिन कौशिकों को विनष्ट करने की कल्पना नहीं की। उस ब्रह्मर्षि ने मेरू की चोटी से छलांग लगा ली। लेकिन वह चट्टठ्ठान पर ऐसे गिरे, जैसे कोई रुई के ढेर पर गिरता है। उन्होंने जब यह देखा कि मैं मरने से बच गया हूं, तब वह जंगल में जल रही विशाल अग्नि में प्रवेश कर गए। यह आग भयंकर रूप से जल रही थी, लेकिन यह भी उन्हें नहीं जला सकी और पूरी तरह से ठंडी पड़ गई। तब वे अपने गले में चट्टठ्ठान को बांधकर समुद्र में कूद पड़े, लेकिन वहां तरंगों ने उन्हें सूखे तट पर लाकर फेंक दिया। वह तब अपनी कुटिया में चले आए। वहां उन्होंने उसे सूनी और निर्जन पाया। तब पुनः दुःख से भर गए और बाहर निकल आए। उन्होंने देखा कि वर्षा होने से विपाशा में बाढ़ आ गई है और वह अपने तट पर बहुत से पेड़ों को उखाड़ती बह रही है। उन्होंने उसमें डूबने की सोची और अपने हाथ-पैरों को बांध उसमें डुबकी लगा ली। लेकिन नदी ने उनके सारे बंधन तोड़ दिए और सूखे तट पर ला दिया। इस नदी का नाम उन्हीं का दिया हुआ है। उन्होंने इसके बाद शतदु्र (सतलुज) नदी को देखा और उन्होंने उसमें छलांग लगा ली। नदी में घडि़याल आदि थे। यह ब्रह्मर्षि को, जो अग्नि के समान दीप्तमान थे, देखकर सैकड़ों दिशाओं में बहने लगी, जिससे इसका यह नाम पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप यह पुनः सूखे तट पर आ गए। उन्होंने जब यह देखा कि वह अपने को नहीं मार सकते, तब वह पुनः अपने आश्रम को लौट गए।’

‘इन दोनों में एक-दूसरे के प्रति व्यापक शत्रुता के ये कुछ विशेष उदाहरण हैं। यह शत्रुता बड़ी भीषण थी। यहां तक कि विश्वामित्र वशिष्ठ की हत्या तक के लिए तैयार थे। इसका वर्णन महाभारत के शल्य पर्व में मिलता है। महाभारतकार लिखता हैः

‘विश्वामित्र और ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के बीच अपनी-अपनी तपस्या में भी भारी शत्रुता थी। ख्1, वशिष्ठ का एक स्थानुतीर्थ में विशाल आश्रम था। उसके पूर्व में विश्वामित्र का आश्रम था। दोनों तपस्वी प्रतिदिन एक-दूसरे से बढ़-चढ़कर आहुतियां देते थे। विश्वामित्र वशिष्ठ के प्रभुत्व को देखकर बहुत अधिक ईर्ष्या रखते थे। वह गहरे सोच में डूब गए। उनका विचार इस प्रकार थाः ‘सरस्वती नदी अपनी धारा के साथ वशिष्ठ ऋषि को, जो जप करने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, मेरे पास बहाकर ले आएगी, जब यह श्रेष्ठ ब्राह्मण मेरे पास आएगा, तो मैं निश्चित रूप से उसका वध कर दूंगा।’ ऐसा संकल्प करके विश्वामित्र ने जब अपनी आंखें खोलीं, तो वे क्रोध से जल उठीं और उन्होंने नदियों की देवी का आह्वान किया। यह देवी सरस्वती उनके पास आई तो वह बड़ी आशंकित हुई, क्योंकि वह उनकी शक्ति से अवगत थी। कांपती हुई वह हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गई, जैसे कि किसी स्त्री का पति उसके सामने मार डाला गया हो। वह बड़ी दुःखी थी। उन्होंने उनसे पूछा कि मैं आपकी क्या सेवा करूं। उत्तेजित मुनि बोले - ‘वशिष्ठ

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 420-422