11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 310

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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को तुरंत मेरे पास लाओ, मैं उसका वध करूंगा। कमल लोचनी देवी ने हाथ जोड़कर भय से ऐसे कांपने लगी जैसे तेज हवा में लताएं कांपती हैं, किंतु विश्वामित्र ने यद्यपि उनकी दशा देख ली थी, फिर भी अपना आदेश दोहराया। सरस्वती जानती थी कि उनका संकल्प कितना पापमय है और वशिष्ठ की शक्ति भी अपरिमेय है। वह कांपती हुई वशिष्ठ की ओर चली गई। वह सोच रही थी कि उसे कहीं दोनों मुनियों का शाप न झेलना पड़े। जो-कुछ विश्वामित्र ने कहा था, उसने वह वशिष्ठ को बताया। उसका लटका हुआ, पीला और चिंतित चेहरा देखकर वशिष्ठ ने कहा, ‘हे नदियों की देवी! जो मुझे कहना है, कह। मुझे निस्संकोच विश्वामित्र के पास ले चल। कहीं वह तुझे शाप न दे दे। दयालु ऋषि की वाणी सुनकर सरस्वती ने सोचा कि वह किस प्रकार बुद्धिमानी का कार्य कर सकती है। उसने मन में विचार किया कि वशिष्ठ मेरे प्रति सदैव दयालु रहे हैं। मुझे इनका कल्याण करना चाहिए। फिर उन्हें विश्वामित्र का ख्याल आया, जो उसके किनारे पर यज्ञ कर रहे थे। उसने सोचा कि यह एक अच्छा अवसर है। अपनी तेज धार से सरस्वती ने अपने किनारे को काट डाला। इस प्रकार मित्र और वरुण (वशिष्ठ के पुत्र) को बहाकर नीचे की ओर ले गई। और जब वह उसे इस तरह बहाकर ले जा रही थी, तो ऋषि ने नदी की पूजार्चना की। हे सरस्वती! तू ब्रह्मकुंड से निकली है और अपनी श्रेष्ठ धाराओं के रूप में सारे संसार में विचरती है। तू आकाश में निवास करती है। तू बादलों के माध्यम से वर्षा करती है। तू ही सभी नदियों का स्वरूप है। तुझमें पालक शक्ति, मेधा और प्रकाश है, तू वाणी है, तू स्वाहा है, ये सारा संसार तेरा दास है, तू सभी प्राणियों की आश्रयदाता है।

‘वशिष्ठ को सरस्वती द्वारा निकट लाते देख विश्वामित्र शस्त्र तलाश करने लगे, जिससे वे वशिष्ठ का वध कर सकें। उनके क्रोध को देखते हुए कि कहीं ब्रह्महत्या न हो जाए, यह सोचकर सरस्वती वशिष्ठ को पूर्वी दिशा में दूर ले गई। इस तरह दोनों ऋषियों के आदेश का पालन तो हो गया, लेकिन विश्वामित्र की मनोकामना पूर्ण नहीं हुई। जब विश्वामित्र ने देखा कि वशिष्ठ इस प्रकार बचा लिए गए हैं, तो वे क्रोध से अधीर हो उठे और नदी से इस प्रकार बोले - ‘हे नदियों की देवी! तूने मुझे चकमा दिया, जा तेरा पानी रक्त में बदल जाएगा, जो केवल राक्षसों के उपयोग में ही आ सकेगा। सरस्वती को जब ऐसा शाप मिला, तो एक वर्ष तक उसमें रक्तिम जल बहता रहा। राक्षसों के लिए उसकी धारा तीर्थस्थल बन गई, विशेष रूप से वह स्थान जहां से वशिष्ठ को बहाया गया था। राक्षस इस रक्त को नाचते-गाते पीने लगे, जैसे कि उन्हें स्वर्ग मिल गया हो। कुछ समय पश्चात् जब वहां कुछ ऋषि आए, तो वे रक्तिम जल को देखकर भयभीत हो गए, जिसे राक्षस उपयोग में ला रहे थे। तब उन्होंने इस नदी की रक्षा का विचार किया।’