11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 311

296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ये उदाहरण कुछ ऐसे हैं, जो एक विशिष्ट ब्राह्मण और एक विशिष्ट क्षत्रिय के बीच व्यक्तिगत संघर्ष के हैं। आगे अब जो उदाहरण दिए जा रहे हैं, वे एक ओर ब्राह्मणों और दूसरी ओर क्षत्रियों के बीच वर्ग या जातिगत संघर्ष से संबंधित है। ये केवल संघर्ष ही नहीं थे, और न इन्हें जातीय संघर्ष जैसा कहना ही ठीक है। ये संघर्ष वर्ग-संघर्ष थे, जो एक वर्ग ने दूसरे वर्ग की जड़ें खोदने के लिए किए थे। महाभारत में ऐसे दो वर्ग संघर्षों का वर्णन है। पहला संघर्ष हैह्य क्षत्रियों और भार्गव ब्राह्मणों के बीच का है। यह संघर्ष हैह्य राजा कृतवीर्य के समय में हुआ। महाभारत के आदि पर्व में इसका वर्णन इस प्रकार हैः

एक राजा था, जिसका नाम कृतवीर्य था। ख्1, इस राजा का पुरोहित भृगु था, जो वेदों में पारंगत था। राजा की कृपा से उसके राजपुरोहित के पास प्रचुर धन-धान्य हो गया। जब वह दिवंगत हो गया तो उसके वंशजों को धन की आवश्यकता पड़ी। वे धन मांगने भृगुओं के पास गए, जिनकी संपन्नता से वे अवगत थे। कुछ भृगुओं ने अपनी संपत्ति जमीन में गाड़ रखी थी। क्षत्रियों के डर के कारण ब्राह्मणों को दान दे दी थी। एक बार ऐसा हुआ कि जब कोई क्षत्रिय जमीन खोद रहा था, तो उसे एक भृगु के घर में गड़ा धन प्राप्त हुआ। उस क्षत्रिय ने दूसरे क्षत्रियों को एकत्र किया और उन सबने उस कोष को देखा। इस पर वे उत्तेजित हो गए, और उन्होंने सभी भृगुओं का वध कर दिया, जिनको वे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। क्षत्रियों ने ब्राह्मणों के गर्भस्थ शिशुओं का भी वध कर दिया। विधवाएं हिमालय पर्वत की ओर भाग गईं। उनमें से एक ने अपने अजन्मे शिशु को अपनी जंघा में छिपा लिया। एक ब्राह्मण ने जब क्षत्रियों को इसकी सूचना दी तो वे उसे मारने पहुंच गए, किंतु वह अपनी माता की जंघा से बाहर निकल आया और अपनी दीप्ति से आक्रमणकारियों को अंधा बना दिया। कुछ काल तक पहाड़ों में भटकने के बाद उन्होंने उस बालक की माता से विनयपूर्वक अपनी दृष्टि लौटाने का अनुरोध किया। किंतु उसने कहा कि वे उसके विलक्षण शिशु और्व के पास जाएं, जिसमें सभी वेदों और छहों वेदांग समाहित हैं, क्योंकि उसी ने अपने संबंधियों के वध के प्रतिकार स्वरूप उनको निर्वस्त्र किया और उनकी दृष्टि छीनी है और वही उनकी दृष्टि उन्हें लौटा सकता है। तद्नुसार वे उसके पास गए और उनकी दृष्टि उन्हें वापस मिल गई। और्व ने सारी सृष्टि के विनाश के लिए तपस्या की, क्योंकि वह भृगुओं के विनाश का प्रतिशोध लेना चाहता था। इसलिए वह तपस्या करने लगा। इस पर देवताओं, असुरों, मानवों में

खलबली मच गई। तब उसके पितृगण प्रकट हुए और उन्होंने उससे कहा कि वह अपना संकल्प त्याग दें, क्योंकि वे क्षत्रियों से कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहते हैं। इसका कारण भृगुओं की निर्बलता भी नहीं है कि वे क्षत्रियों के द्वारा किए गए हत्याकांड को भूल जाएं। उन्होंने कहा कि जब हम अपनी वृद्धावस्था से ऊब चुके थे तो हम स्वयं यह

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 448-49