11. ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय - Page 312

ब्राह्मण बनाम क्षत्रिय

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चाहते थे कि क्षत्रिय हमारी हत्या कर दें। किसी भृगु के घर में जो धन छिपा था, वह भी घृणा उत्पन्न करने के लिए जान-बूझकर छिपाया गया था, ताकि क्षत्रिय भड़क उठें। हम सब स्वर्ग में आना चाहते थे। हमें धन से कोई लेना-देना नहीं था। उसके पितरों ने कहा कि उन्होंने यह उपाय सोचा, क्योंकि वे आत्महत्या का पाप नहीं करना चाहते थे। और अंत में उन्होंने और्व से कहा कि वह अपना क्रोध त्याग दे और उस पाप का भागी न बने जो वह सोच रहा है। उन्होंने कहा-हे पुत्र! क्षत्रियों का विनाश न कर, और न ही सातों लोकों को नष्ट कर। अपने क्रोध का दमन कर जो तेरी तपस्या को निष्फल कर देगा। किंतु और्व ने उत्तर दिया कि वह अपने वचन को व्यर्थ नहीं जाने देगा। जब तक उसका क्रोध किसी का विनाश नहीं करेगा तो वह स्वयं ही अपने क्रोध की चपेट में आ जाएगा और उसने न्याय, औचित्य तथा कर्तव्य की साक्षी देकर अपने पितरों की दयाशीलता का प्रतिवाद किया। किंतु उसके पितरों ने उसे समझा लिया और कहा कि वह अपने क्रोध की अग्नि को समुद्र में छोड़ दे, जहां वह जल में जंतुओं का विनाश कर देगी और इस प्रकार उसके वचन की पूर्ति भी हो जाएगी।’

दूसरा वर्ग युद्ध, और जो विनाशकारी भी था, भार्गव ब्राह्मणों ने हैह्य क्षत्रियों के विरुद्ध छेड़ा था। इसमें भार्गव ब्राह्मणों के नेता परशुराम थे। परशुराम के जन्म की कथा विष्णु पुराण में इस प्रकार आती हैः

‘गाधि की पुत्री सत्यवती का विवाह ऋचीक नाम के एक वृद्ध ब्राह्मण से हुआ, जो भृगु वंश का था। ख्1, इसका उद्देश्य यह था कि उससे जो पुत्र उत्पन्न हो, उसमें ब्राह्मण के गुण विद्यमान हों। ऋचीक ने अपनी स्त्री के लिए चावल, जौ, दाल, घी और दूध से युक्त चारू नामक भोजन तैयार कराया। इसी प्रकार का पदार्थ उसने अपनी पत्नी की माता के लिए भी तैयार कराया। उनका विचार था कि वह भी एक ऐसा पुत्र उत्पन्न करें, जिसमें योद्धा के गुण विद्यमान हों। किंतु सत्यवती की मां ने अपनी पुत्री को समझा-बुझा कर उसका भोजन अपने भोजन के साथ बदल दिया। जब उसके पति घर लौटे तो अपनी पत्नी से यह जानकर बहुत कुपित हुए।’

मैं उसके कथन को मूल रूप से नीचे उद्धृत कर रहा हूंः

‘हे पापी स्त्री, तूने यह क्या कर दिया। मुझे तेरा शरीर भयानक प्रतीत होता है। अवश्य ही तूने अपनी माता के लिए तैयार किए चारू भोजन को खाया है। यह ठीक नहीं हुआ। मैंने उसमें वीरों के सभी गुण, संपूर्ण पराक्रम, शूरता और बल की संमत्ति का आरोपण किया था। तुम्हारे भोजन में शांति, ज्ञान, तितिक्षा आदि संपूर्ण ब्राह्मणोचित गुणों का समावेश किया था। उनका विपरीत उपयोग करने से तेरे जो पुत्र होगा, वह अति भयानक, युद्धप्रिय और

  1. म्यूर, खंड 1, पृ. 349-350