298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
हत्या-कर्म में प्रवृत्त क्षत्रियों जैसा आचरण करने वाला होगा और तुम्हारी माता के शांतिप्रिय और ब्राह्मणों का आचरण करने वाला पुत्र होगा। यह सुनते ही सत्यवती ने अपने पति के चरण पकड़ लिए और कहा - भगवन्, मैंने अज्ञान से ही ऐसा किया है। मुझ पर दया कीजिए और ऐसा कीजिए कि मेरा पुत्र ऐसा नहीं हो, जैसा कि आपने वर्णन किया है। भले ही वैसे गुण वाला पौत्र हो जाए। इस पर मुनि ने कहा ऐसा ही होगा।
‘तदन्तर उसने जमदग्नि को जन्म दिया और उसकी माता ने विश्वामित्र को उत्पन्न किया। सत्यवती कौशिकी नाम की नदी हो गई। जमदग्नि ने इक्ष्वाकु वंश की रेणु की कन्या रेणुका से विवाह किया। उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम परशुराम था।’
महाभारत के वन पर्व में परशुराम के परिवार का और भी ब्यौरा मिलता है, जो निम्नलिखित हैः
‘जमदग्नि और सत्यवती के पांच पुत्र थे। ख्1, उनमें सबसे छोटा पुत्र परशुराम था, जो उग्र स्वभाव का था। उसने अपने पिता की आज्ञा से अपनी माता का वध कर दिया था, जो कुवासना में ग्रस्त होने के कारण पवित्र नहीं रह गई थी। उसके चार भाइयों ने अपनी मां का वध करना अस्वीकार कर दिया था और इस कारण अपने पिता के शाप के कारण उनका तेज नष्ट हो गया था। किंतु परशुराम के आग्रह पर उसके पिता ने उनकी माता को पुनः जीवित कर दिया और उसके भाइयों को उनकी शक्ति लौटा दी थी। परशुराम मातृहत्या के पाप से मुक्त हो जाता है और अपने पिता से चिरायु होने का वरदान प्राप्त करता है।’
दूसरा जाति-युद्ध राजा कृतवीर्य के पुत्र हैह्य वंशीय राजा अर्जुन के शासन काल में हुआ था। इस संघर्ष का आरंभ ब्राह्मणों से हुआ, जो अपने कुछ विशेषाधिकारों और शक्तियों पर बल दे रहे थे और अर्जुन तिरस्कारयुक्त शब्दों द्वारा उनकी भर्त्सना कर रहा था। महाभारत के अनुशासन पर्व में इसका वर्णन इस प्रकार हुआ हैः
‘तब सूर्य के समान चमकते हुए तेजस्व रथ पर चढ़कर अपने पराक्रम के नशे में उन्मत्त होकर वह बोला - वीरता, साहस, ख्याति, शूरता, शक्ति और बल की दृष्टि से कौन मेरी बराबरी कर सकता है? ख्2, जब वह अपनी बात कह चुका तब उसे संबोधित करते हुए आकाशवाणी हुई, हे मूर्ख, क्या तू नहीं जानता कि ब्राह्मण क्षत्रिय से उत्तम होता है। क्षत्रिय अपनी प्रजा पर जो शासन करता है, वह ब्राह्मण की सहायता से करता है। अर्जुन ने उत्तर दिया, यदि मैं चाहूं तो सृष्टि कर सकता हूं और यदि मैं कु्रद्ध हो जाऊं तो सभी जीवों का विनाश कर दूं। कोई ब्राह्मण कार्य, विचार या शब्द में मुझसे श्रेष्ठ नहीं है। पहला सिद्धांत यह है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं और दूसरा यह कि क्षत्रिय श्रेष्ठ
म्यूर, खंड 1, पृ. 450
म्यूर, खंड 1, पृ. 454